Indian Railway: प्लेटफॉर्म खाली फिर भी आउटर पर क्यों खड़ी रहती ट्रेन? जानें रेलवे के हिडन नियम, जो स्टेशन मास्टर भी नहीं बदल सकता!

Edited By Updated: 19 Feb, 2026 03:18 PM

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रेल यात्रा के दौरान अक्सर ऐसा होता है कि स्टेशन बिल्कुल सामने दिखाई दे रहा होता है, प्लेटफॉर्म भी खाली नजर आते हैं, लेकिन आपकी ट्रेन 'आउटर' पर खड़ी होकर सिग्नल का इंतजार करती रहती है। यह स्थिति किसी भी यात्री को झुंझलाहट से भर सकती है। हम में से...

नेशनल डेस्क:   रेल यात्रा के दौरान अक्सर ऐसा होता है कि स्टेशन बिल्कुल सामने दिखाई दे रहा होता है, प्लेटफॉर्म भी खाली नजर आते हैं, लेकिन आपकी ट्रेन 'आउटर' पर खड़ी होकर सिग्नल का इंतजार करती रहती है। यह स्थिति किसी भी यात्री को झुंझलाहट से भर सकती है। हम में से ज्यादातर लोग इसे रेलवे की लापरवाही या स्टाफ की सुस्ती मान लेते हैं, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। दरअसल, ट्रेन को स्टेशन के गेट पर रोकने के पीछे रेलवे के बेहद जटिल सुरक्षा नियम और 'प्लेटफॉर्म अलॉटमेंट' का गणित काम करता है।

तय प्लेटफॉर्म की 'लक्ष्मण रेखा'
रेलवे के ऑपरेटिंग सिस्टम में हर ट्रेन का प्लेटफॉर्म पहले से ही निर्धारित होता है। यह फैसला ट्रेन की लंबाई, उसके आने की दिशा और आगे के रूट को ध्यान में रखकर टाइम-टेबल के समय ही ले लिया जाता है। अगर किसी ट्रेन के लिए प्लेटफॉर्म नंबर 4 तय है और वहां पहले से ही कोई दूसरी ट्रेन खड़ी है, तो पीछे से आने वाली ट्रेन को आउटर पर तब तक इंतजार करना होगा जब तक वह जगह खाली न हो जाए। भले ही उस समय प्लेटफॉर्म नंबर 1 या 2 पूरी तरह खाली पड़े हों, ट्रेन को अचानक वहां नहीं मोड़ा जा सकता।

ट्रैक का जाल और तकनीकी पेच
यात्रियों को लगता है कि खाली प्लेटफॉर्म पर ट्रेन को ले जाना आसान है, लेकिन तकनीकी रूप से हर ट्रैक हर प्लेटफॉर्म से नहीं जुड़ा होता। रेलवे स्टेशन पर पटरियों का जो जाल (Points and Crossings) बिछा होता है, उसकी अपनी सीमाएं होती हैं। कई बार मुख्य लाइन से आने वाली ट्रेन के पास चुनिंदा प्लेटफॉर्म्स पर ही जाने का रास्ता होता है।

स्टेशन मास्टर भी नहीं बदल सकता, नियम!
अगर स्टेशन मास्टर अचानक प्लेटफॉर्म बदलने का फैसला ले भी ले, तो उसे पूरे सिग्नलिंग सिस्टम को री-सेट करना पड़ेगा, जिसमें काफी समय लगता है और इससे दूसरी ट्रेनों का शेड्यूल भी बिगड़ सकता है।

सुरक्षा और यात्रियों की सुविधा का तालमेल
सिर्फ ट्रैक ही नहीं, यात्रियों की सुविधा भी एक बड़ा कारण है। अगर आखिरी मिनट पर प्लेटफॉर्म बदल दिया जाए, तो स्टेशन पर भारी अफरा-तफरी मच सकती है। सैकड़ों यात्री सामान लेकर एक प्लेटफॉर्म से दूसरे पर भागेंगे, जिससे दुर्घटना की आशंका बढ़ जाती है। साथ ही, ट्रेन की दिशा बदलने के लिए 'Points' सेट करने होते हैं और जब तक कंट्रोल रूम से ग्रीन सिग्नल नहीं मिलता, ड्राइवर ट्रेन को इंच भर भी आगे नहीं बढ़ा सकता। इसलिए, आउटर पर खड़ी ट्रेन असल में एक सुरक्षित और व्यवस्थित सफर का हिस्सा होती है, न कि किसी की लापरवाही।
 

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