Edited By Ramanjot,Updated: 02 Feb, 2026 09:25 PM

महाराष्ट्र में 12 जिला परिषदों और 125 पंचायत समितियों के चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, सियासत का पारा लगातार चढ़ता जा रहा है।
नेशनल डेस्क: महाराष्ट्र में 12 जिला परिषदों और 125 पंचायत समितियों के चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, सियासत का पारा लगातार चढ़ता जा रहा है। इसी बीच कैबिनेट मंत्री और बीजेपी नेता नितेश राणे के एक बयान ने चुनावी माहौल को और ज्यादा गर्मा दिया है। राणे ने खुले मंच से यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया कि अगर शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट – UBT) के उम्मीदवार इन चुनावों में जीतते हैं, तो उनके इलाकों में सरकारी विकास फंड पर ब्रेक लग सकता है।
चुनावी मंच से सीधी चेतावनी
रविवार को सिंधुदुर्ग जिले के कंकावली में फोंडा निर्वाचन क्षेत्र की एक जनसभा को संबोधित करते हुए नितेश राणे ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि फंड जारी करने में चुनाव चिह्न ही सबसे बड़ा पैमाना होता है।
राणे के मुताबिक,कमल (बीजेपी) या धनुष-बाण (शिवसेना – शिंदे गुट) का निशान दिखते ही फंड मंजूर हो जाता है। लेकिन अगर कहीं जलती मशाल (शिवसेना UBT) नजर आ गई, तो पहले से स्वीकृत रकम में भी कटौती कर दी जाएगी।
ग्राम पंचायत चुनाव का दिया उदाहरण
बीजेपी नेता ने दावा किया कि यही फॉर्मूला पहले भी ग्राम पंचायत चुनावों में अपनाया गया था। उन्होंने कहा कि सरपंचों को साफ संदेश दिया गया था— “या तो पंचायत हमारे साथ लाओ, नहीं तो विकास के लिए एक पैसा नहीं मिलेगा।” राणे का दावा है कि इस चेतावनी के बाद बड़ी संख्या में सरपंच महायुति के साथ जुड़ गए।
चुनाव पिता नारायण राणे के नेतृत्व में!
नितेश राणे ने यह भी कहा कि इन स्थानीय चुनावों की कमान उनके सांसद पिता नारायण राणे के हाथ में है और आने वाले पांच साल तक जिला प्रशासन पर उनका प्रभाव रहेगा।
यूबीटी उम्मीदवारों को लेकर उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि वे प्रचार में मुश्किल से नजर आ रहे हैं। चुनाव खत्म होने के बाद उन्हें भी विकास कार्यों के लिए हमारे दरवाजे पर आना पड़ेगा।
चुनाव की तारीखें और बढ़ता विवाद
महाराष्ट्र में 7 फरवरी को मतदान और 9 फरवरी को मतगणना होनी है। नितेश राणे के बयान के बाद विपक्ष ने इसे लोकतंत्र, निष्पक्ष चुनाव और विकास की भावना के खिलाफ बताया है। वहीं महायुति गठबंधन आक्रामक प्रचार में जुटा हुआ है। यह पूरा विवाद अब सरकारी फंड के राजनीतिक इस्तेमाल और चुनावी नैतिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।