Edited By Mehak,Updated: 15 Jan, 2026 07:01 PM

सुप्रीम कोर्ट ने विधवा महिला के अधिकारों को मजबूत करते हुए कहा कि वह अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण की हकदार है, भले ही वह ससुर के निधन के बाद विधवा हुई हो। अदालत ने मनुस्मृति का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि भरण-पोषण कानूनों का उद्देश्य आश्रितों...
नेशलन डेस्क : सुप्रीम कोर्ट ने विधवा महिला के पक्ष में अहम फैसला देते हुए कहा है कि वह अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण पाने की अधिकारिणी है, चाहे वह ससुर के निधन के बाद विधवा हुई हो। अदालत ने मनुस्मृति का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि भरण-पोषण से जुड़े कानूनों की मूल भावना आज भी आश्रितों की देखभाल सुनिश्चित करना है।
यह फैसला जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस.वी.एन. भाटी की पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने अपने आदेश में प्राचीन ग्रंथ मनुस्मृति का भी उल्लेख किया और कहा कि भारतीय समाज में सदियों से यह मान्यता रही है कि परिवार के मुखिया की जिम्मेदारी होती है कि वह आश्रित महिलाओं का संरक्षण करे। अदालत ने कहा कि आज के कानूनों के पीछे भी यही मूल भावना है।
मामला एक ऐसी महिला से जुड़ा था, जिसके पति की मृत्यु उसके ससुर के देहांत के बाद हुई थी। फैमिली कोर्ट ने इस आधार पर महिला की याचिका खारिज कर दी थी कि वह ससुर की मृत्यु के समय विधवा नहीं थी। इसके बाद महिला ने हाईकोर्ट का रुख किया, जहां फैमिली कोर्ट के फैसले को सही नहीं माना गया और मुआवजा तय करने के निर्देश दिए गए।
इस आदेश के खिलाफ मृतक पति के भाई की पत्नी और एक अन्य महिला ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। दूसरी महिला ने दावा किया कि वह लंबे समय तक ससुर के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रही है, इसलिए संपत्ति पर विधवा बहू का कोई अधिकार नहीं बनता। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अपीलों को खारिज कर दिया।
अदालत ने हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम (HAMA) का हवाला देते हुए कहा कि कानून के तहत विधवा बहू आश्रित की श्रेणी में आती है और वह ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण की मांग कर सकती है। कानून में कहीं यह शर्त नहीं है कि पति की मृत्यु ससुर के जीवनकाल में ही होनी चाहिए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी विधवा को भरण-पोषण से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 21, यानी जीवन के अधिकार का उल्लंघन होगा। यदि महिला को सहारा नहीं मिला तो वह गरीबी और असुरक्षा की स्थिति में पहुंच सकती है। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने विधवा महिलाओं के सामाजिक और कानूनी अधिकारों को स्पष्ट रूप से मान्यता दी है।