देश के इस गाँव में बना इतिहास, पहली बार किसी लड़के ने की 10वीं पास

Edited By Updated: 06 May, 2025 11:10 AM

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उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के निजामपुर गांव में एक ऐतिहासिक क्षण आया है। इस गांव में लगभग 30 घर हैं और सभी दलित समुदाय के हैं। पहली बार किसी लड़के ने 10वीं कक्षा की परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की है। यह उपलब्धि 15 वर्षीय रामसेवक ने हासिल की है,...

नेशनल डेस्क. उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के निजामपुर गांव में एक ऐतिहासिक क्षण आया है। इस गांव में लगभग 30 घर हैं और सभी दलित समुदाय के हैं। पहली बार किसी लड़के ने 10वीं कक्षा की परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की है। यह उपलब्धि 15 वर्षीय रामसेवक ने हासिल की है, जो शादियों में सिर पर रोड लाइट उठाकर मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करता है।

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रामसेवक का स्कूली नाम रामकेवल है। उन्होंने ने यूपी बोर्ड की 10वीं की परीक्षा में 55% अंक प्राप्त किए हैं, जब बाराबंकी के जिलाधिकारी (डीएम) को इस असाधारण उपलब्धि के बारे में पता चला कि उनके जिले के निजामपुर गांव से पहली बार कोई लड़का 10वीं पास हुआ है, तो उन्होंने रामसेवक को मिलने के लिए बुलाया। यह रामसेवक के जीवन का एक और महत्वपूर्ण दिन था, क्योंकि इसी दिन उन्होंने पहली बार जूते पहने थे।

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रामसेवक ने अपनी प्राथमिक शिक्षा गांव के ही प्राइमरी स्कूल से पूरी की। इसके बाद छठी कक्षा में उन्होंने गांव से लगभग 500 मीटर दूर स्थित राजकीय इंटर कॉलेज में दाखिला लिया। रामसेवक बताते हैं कि उनके गांव के कुछ लोग अक्सर उनसे कहते थे कि पढ़कर वह क्या ही कर लेंगे और यह भी कि वह 10वीं की परीक्षा पास नहीं कर पाएंगे। लेकिन रामसेवक ने इन नकारात्मक बातों को चुनौती के रूप में लिया और यह ठान लिया था कि वह अवश्य सफल होकर दिखाएंगे।

अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए रामसेवक ने कठिन परिश्रम किया। तीन भाइयों में सबसे बड़े होने के कारण उनके युवा कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी भी थी। इसलिए वह शादियों के मौसम में रात को सिर पर लाइट उठाकर मजदूरी करते थे, जिससे उन्हें 200-300 रुपये मिल जाते थे, जब शादियों का सीजन नहीं होता था, तो वह अन्य दिहाड़ी मजदूरी करके पैसे कमाते थे। इन्हीं पैसों से उनके घर का खर्च चलता था और अपनी कॉपी-किताबों और स्कूल की फीस का भी इंतजाम होता था। रामसेवक के अनुसार, उन्होंने मजदूरी करके अपनी 10वीं कक्षा की 2100 रुपये की फीस जमा की थी।

अपनी पढ़ाई के प्रति रामसेवक का समर्पण अद्भुत है। वह बताते हैं कि शादियों में देर रात तक काम करने के बाद भी वह घर लौटकर एक-दो घंटे पढ़ाई करते थे, जो भी चीजें उन्हें समझ में नहीं आती थीं, उन्हें वह लिखकर रखते थे और अगले दिन अपने शिक्षकों से पूछते थे। इस प्रकार मजदूरी के साथ-साथ पढ़ाई करके रामसेवक ने 10वीं की परीक्षा पास करके न केवल अपने गांव के लिए बल्कि उन सभी के लिए एक प्रेरणादायक मिसाल कायम की है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी शिक्षा प्राप्त करने का सपना देखते हैं।

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