Edited By jyoti choudhary,Updated: 06 Jan, 2026 11:04 AM

कच्चे तेल को लेकर भारत के लिए राहत की खबर है। अमेरिका की ओर से वेनेजुएला पर कार्रवाई के बाद जहां तेल सप्लाई बढ़ने की संभावनाएं बनी हुई हैं, वहीं ओपेक देशों ने फिलहाल उत्पादन में कोई बदलाव न करने का फैसला किया है। इस फैसले से छोटी अवधि में कच्चे तेल...
बिजनेस डेस्कः कच्चे तेल को लेकर भारत के लिए राहत की खबर है। अमेरिका की ओर से वेनेजुएला पर कार्रवाई के बाद जहां तेल सप्लाई बढ़ने की संभावनाएं बनी हुई हैं, वहीं ओपेक देशों ने फिलहाल उत्पादन में कोई बदलाव न करने का फैसला किया है। इस फैसले से छोटी अवधि में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल की आशंका कम हुई है और क्रूड के भाव में गिरावट दर्ज की गई है।
यमन में जारी संघर्ष और वेनेजुएला को लेकर बनी अनिश्चितता के चलते हाल के दिनों में तेल कीमतों में तेजी की आशंका जताई जा रही थी। हालांकि अब भाव उन स्तरों की ओर लौटते दिख रहे हैं, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अनुकूल माने जाते हैं।
कहां पहुंचे कच्चे तेल के भाव
मंगलवार को कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देखने को मिली। ट्रेडर्स का मानना है कि अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो को हिरासत में लिए जाने के बाद वहां से कच्चे तेल के उत्पादन में बढ़ोतरी हो सकती है। इसके अलावा कमजोर वैश्विक मांग के बीच इस साल तेल की आपूर्ति पर्याप्त बने रहने की उम्मीद भी कीमतों पर दबाव बना रही है।
ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 0.4 फीसदी गिरकर 61.5 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड 0.5 फीसदी टूटकर करीब 58 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखा। विशेषज्ञों के मुताबिक, भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर स्थिति तब मानी जाती है जब कच्चे तेल की कीमतें लंबी अवधि में 60 डॉलर या उससे नीचे बनी रहें।
ओपेक की रणनीति पर नजर
क्रूड बाजार की नजर ओपेक प्लस देशों पर भी बनी हुई है। वेनेजुएला पर कार्रवाई के बाद हुई ओपेक प्लस की बैठक में इस मुद्दे पर कोई विशेष चर्चा नहीं की गई और उत्पादन को मौजूदा स्तर पर ही बनाए रखने का फैसला लिया गया।
दुनिया के करीब आधे कच्चे तेल का उत्पादन करने वाले OPEC+ देशों की यह बैठक ऐसे समय में हुई है, जब 2025 में तेल कीमतें अब तक 18 फीसदी से ज्यादा गिर चुकी हैं, जो 2020 के बाद सबसे बड़ी सालाना गिरावट मानी जा रही है। इससे ओवरसप्लाई को लेकर चिंताएं और बढ़ गई हैं।
एक्सपर्ट्स की राय
Rystad Energy के एनालिस्ट और ओपेक के पूर्व अधिकारी जॉर्ज लियोन का कहना है कि फिलहाल तेल बाजार पर आपूर्ति और मांग से ज्यादा भूराजनीतिक अनिश्चितताओं का असर दिख रहा है। उनके अनुसार, OPEC+ इस समय किसी आक्रामक कदम के बजाय बाजार में स्थिरता बनाए रखने को प्राथमिकता दे रहा है। ओपेक की अगली बैठक 1 फरवरी को होने वाली है, जिस पर बाजार की करीबी नजर रहेगी।