शेयर बाजार में 15 साल की सबसे बड़ी गिरावट, 2011 के बाद सबसे ज्यादा नुकसान, डूबे $533 अरब

Edited By Updated: 13 Mar, 2026 12:30 PM

stock market witnesses largest decline 15 years

साल 2026 भारतीय शेयर बाजार के निवेशकों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। अभी साल के केवल ढाई महीने ही बीते हैं लेकिन इस दौरान निवेशकों को पिछले कई वर्षों की तुलना में सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है। लगातार बिकवाली और वैश्विक अनिश्चितताओं के...

बिजनेस डेस्कः साल 2026 भारतीय शेयर बाजार के निवेशकों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। अभी साल के केवल ढाई महीने ही बीते हैं लेकिन इस दौरान निवेशकों को पिछले कई वर्षों की तुलना में सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है। लगातार बिकवाली और वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण बाजार पर भारी दबाव बना हुआ है।

आंकड़ों के मुताबिक इस साल अब तक निवेशकों की करीब 533 अरब डॉलर यानी लगभग 48.5 लाख करोड़ रुपए की संपत्ति बाजार से साफ हो चुकी है। यह गिरावट 2011 के बाद सबसे बड़ी मानी जा रही है। उस समय भी बाजार में करीब 625 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी।

भारतीय बाजार में गिरावट का असर इतना बड़ा रहा है कि यह कई देशों के कुल बाजार नुकसान से भी ज्यादा है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हुआ नुकसान Mexico, Malaysia, South Africa, Norway, Finland, Vietnam और Poland के बाजारों में हुई कुल गिरावट से भी ज्यादा बताया जा रहा है।

मार्केट कैप में गिरावट

फिलहाल भारतीय शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैप करीब 4.77 ट्रिलियन डॉलर रह गया है, जो अप्रैल 2025 के बाद का सबसे निचला स्तर है। साल 2026 की शुरुआत में यह करीब 5.3 ट्रिलियन डॉलर था यानी कुछ ही समय में बाजार पूंजीकरण में करीब 10 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।

गिरावट के पीछे कारण

इस गिरावट के पीछे विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली एक बड़ा कारण है। Foreign Institutional Investors ने 2025 के बाद 2026 में भी भारतीय बाजार से पैसा निकालना जारी रखा है। इसके अलावा कंपनियों की कमाई में सुस्ती, वैश्विक व्यापार तनाव और टैरिफ विवादों ने भी बाजार की दिशा कमजोर की है।

पश्चिम एशिया में तनाव

इसी बीच पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष ने हालात को और मुश्किल बना दिया है। Donald Trump के टैरिफ विवादों के बाद अब Iran और खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते युद्ध ने वैश्विक बाजारों को झटका दिया है। इसके चलते कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं, जिससे भारत के आयात बिल और महंगाई बढ़ने की आशंका भी तेज हो गई है।

विश्लेषकों के अनुसार अगर कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी होती है तो भारत के चालू खाते के घाटे में करीब 9 अरब डॉलर तक का इजाफा हो सकता है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
 

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