जीवन में चाहिए स्थायी सुख और शांति ? बस आज से अपनाएं ये एक सरल उपाय

Edited By Updated: 13 Apr, 2025 10:51 AM

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हर इंसान का अंतिम लक्ष्य होता है- सुख, शांति, और आनंद। चाहे हम धन कमाएं, रिश्ते बनाएं, पद-प्रतिष्ठा हासिल करें या बड़ी उपलब्धियां, इन सबके पीछे सिर्फ एक ही चाह होती है कि जीवन में शांति हो

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Anmol Vachan:  हर इंसान का अंतिम लक्ष्य होता है- सुख, शांति, और आनंद। चाहे हम धन कमाएं, रिश्ते बनाएं, पद-प्रतिष्ठा हासिल करें या बड़ी उपलब्धियां, इन सबके पीछे सिर्फ एक ही चाह होती है कि जीवन में शांति हो, मन में सुकून हो और भीतर से आनंद की अनुभूति हो। लेकिन क्या यह सब हमें मिल पाता है ? अक्सर नहीं। क्योंकि हम बाहर की दुनिया में इस स्थायी सुख और आनंद को ढूंढते हैं, जबकि इसका मूल स्रोत हमारे भीतर है।

यदि आप सच में चाहते हैं कि जीवन में स्थायी सुख और शांति बनी रहे, तो आज से ही आपको एक कार्य को अपने जीवन में अपनाना होगा और वह है अंतर्मुखी होकर आत्मचिंतन और स्वीकृति की साधना। यह सुनने में भले ही गूढ़ लगे, परंतु इसका प्रभाव गहरा और स्थायी होता है।

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स्वयं को जानिए
हम में से अधिकतर लोग दिनभर दूसरों को देखते हैं, उनका आकलन करते हैं, समाज की अपेक्षाओं के अनुसार जीवन जीते हैं लेकिन हम खुद को कितनी बार देखते हैं ? खुद से सवाल कितनी बार पूछते हैं ?

आत्मचिंतन का मतलब है खुद को, अपनी सोच को, अपनी आदतों और भावनाओं को समझना। जब आप दिन में कुछ समय खुद के साथ बिताना शुरू करेंगे, शांत होकर बैठेंगे और अपने भीतर झांकेंगे तो आपको वो सारी उलझनों की जड़ें दिखने लगेंगी, जो वर्षों से मन में बैठी हैं।

स्वीकार्यता 
जीवन में दुख तब आता है जब हम चीजों को बदलना चाहते हैं लोगों को, परिस्थितियों को और कभी-कभी खुद को भी लेकिन सच्चा सुख तब आता है जब हम स्वीकारना सीख जाते हैं कि हर व्यक्ति, हर स्थिति, हर घटना, अपनी प्रकृति में परिपूर्ण है।

स्वीकार्यता का अभ्यास करें:
यदि कोई वैसा नहीं है जैसा आप चाहते हैं, तो उसे वैसे ही स्वीकारें।
अगर कुछ परिस्थितियां आपकी योजना के अनुसार नहीं चल रही हैं, तो उन्हें एक सीख समझें।
खुद की गलतियों को भी अपनाएं, उन्हें दोष न मानें बल्कि अनुभव मानें।
स्वीकार्यता का मतलब यह नहीं कि आप सुधार करना छोड़ दें, बल्कि यह कि आप लड़ाई करना छोड़ दें और यहीं से शांति शुरू होती है।

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ध्यान 
ध्यान यानी मन की चुप्पी। जब मन शांत होता है, तो भीतर से आनंद की अनुभूति होती है। हम जितना ज्यादा सोचते हैं, उतनी ही ज़्यादा बेचैनी, चिंता और तनाव उत्पन्न होता है। लेकिन जब हम चुप होकर बैठते हैं, गहरी सांस लेते हैं, और सिर्फ अपनी उपस्थिति को महसूस करते हैं तब आनंद स्वतः ही प्रकट होता है।

तुलना और अपेक्षाओं से मुक्ति पाएं
आज का मनुष्य दुखी नहीं है क्योंकि उसके पास कम है, वह दुखी है क्योंकि दूसरों के पास ज्यादा है। हम अपने जीवन की तुलना लगातार करते रहते हैं सोशल मीडिया, रिश्तेदारों, सहकर्मियों या दोस्तों से और यही तुलना हमें कभी भी स्थायी सुख नहीं लेने देती।

दूसरों को माफ करें और खुद को भी
कई बार हमारी अशांति का कारण बाहर नहीं, बल्कि हमारे अं
दर दबी हुई भावनाएं होती हैं गुस्सा, नफरत, दुःख या पछतावा। जब तक हम इन भावनाओं को पकड़े रहते हैं, तब तक सुख और शांति आ ही नहीं सकती।

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