Dhanteras: आपके परिवार को सुरक्षा कवच देता है धनतेरस, ये है खास जानकारी

Edited By Niyati Bhandari,Updated: 23 Oct, 2022 08:45 AM

dhanteras 2022

कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए

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Dhanteras 2022: कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए पंचदिवसीय त्योहार दिवाली की शुरुआत धनतेरस या धनत्रयोदशी से शुरू होती है।

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Dhanteras puja muhurat पूजन का शुभ मुहूर्त हिंदू कैलेंडर के अनुसार धनतेरस का पर्व कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। पूजा त्रयोदशी तिथि को प्रदोषकाल में करने का विधान होता है। इस साल कार्तिक माह की त्रयोदशी 22 अक्तूबर को शाम 6 बजकर 2 मिनट से प्रारंभ होकर 23 अक्तूबर शाम 6 बजकर 3 मिनट तक है। हिंदू धर्म के अनुसार कोई भी त्योहार उदया तिथि के आधार पर होता है, ऐसे में त्रयोदशी की उदया तिथि 23 अक्तूबर को है। वहीं सर्वार्थ सिद्धि योग 23 अक्तूबर को सुबह 6 बजकर 32 मिनट से आरंभ होकर दोपहर 2 बजकर 33 मिनट पर समाप्त हो जाएगा।

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Remember in Dhanteras worship धनतेरस पूजन में रखें याद
उत्तर दिशा में करें मां लक्ष्मी, कुबेर व धन्वंतरि की पूजा।
घी का दीपक जलाएं, कुबेर को सफेद, भगवान धन्वंतरि को पीली मिठाई चढ़ाएं।
मां लक्ष्मी-गणेश का पूजन कर फूल चढ़ाएं व भोग लगाएं।
दक्षिण दिशा में यम का दीया जलाएं।
घर के बाहर ड्योढ़ी पर 5 दीये अवश्य जलाएं।

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Importance of Deepak on Dhanteras धनतेरस पर दीया जलाने का महत्व: इसे लेकर एक कथा प्रचलित है। कथानुसार राजा हेम को देवकृपा से पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। कुंडली जांचने के दौरान पंडितों ने बताया कि बालक शादी के ठीक 4 दिन बाद मृत्यु को प्राप्त होगा। राजा दुखी हुए और राजकुमार को स्त्री की परछाई से भी दूर भेज दिया। एक दिन वहां से एक राजकुमारी गुजरी। राजकुमार-राजकुमारी पर मोहित हो गया और उसने गंधर्व विवाह कर लिया। विवाह के 4 दिन बाद यमदूत राजकुमार के प्राण लेने आए। जब राजकुमार के प्राण यमदूत ले रहे थे तो राजकुमारी विलाप करने लगी। यमदूत का मन द्रवित हो उठा, उसने यमराज से विनती करते हुए कहा कि कुछ ऐसा करें कि अकाल मृत्यु से राजकुमार मुक्त हो जाए। दूत के अनुरोध पर यमराज बोले कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीपमाला दक्षिण दिशा की ओर भेंट करेगा, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं होगा। यही वजह है कि धनतेरस पर दक्षिण की ओर मुख कर दीप जलाया जाता है।

 

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