घर में हमेशा थोड़ा अधिक बनना चाहिए भोजन, जानें क्यों इसे माना गया है शुभ ?

Edited By Updated: 14 Jan, 2026 12:17 PM

ghar ka bhojan

Ghar Ka Bhojan: भारतीय संस्कृति और हिंदू शास्त्रों में अन्न को केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि ब्रह्म माना गया है। हमारे बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि घर में खाना हमेशा थोड़ा बढ़कर ही बनाना चाहिए। आधुनिक दौर में भले ही हम इसे वेस्टेज के डर से केवल...

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ

Ghar Ka Bhojan: भारतीय संस्कृति और हिंदू शास्त्रों में अन्न को केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि ब्रह्म माना गया है। हमारे बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि घर में खाना हमेशा थोड़ा बढ़कर ही बनाना चाहिए। आधुनिक दौर में भले ही हम इसे वेस्टेज के डर से केवल नाप-तोल कर बनाने लगे हों लेकिन शास्त्रों और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भोजन का थोड़ा अधिक मात्रा में बनना अत्यंत शुभ और समृद्धि प्रदायक माना जाता है।

अतिथि देवो भव:
भारतीय दर्शन की नींव 'अतिथि देवो भव:' पर टिकी है। शास्त्रों के अनुसार, यदि कोई अतिथि आपके द्वार पर भोजन के समय आ जाए और आपके पास पर्याप्त भोजन न हो, तो यह गृहस्थ के लिए बड़ा दोष माना जाता है। प्राचीन काल में यह माना जाता था कि भोजन केवल परिवार के सदस्यों के लिए नहीं, बल्कि उस 'अनजान' अतिथि के लिए भी है जो ईश्वर का रूप बनकर आ सकता है। यदि खाना जरूरत से थोड़ा ज्यादा बना है, तो गृहस्वामी बिना किसी हिचकिचाहट के आगंतुक का सत्कार कर पाता है। इससे घर में बरकत बनी रहती है।

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पंचमहायज्ञ का निर्वहन
शास्त्रों में एक गृहस्थ के लिए पंचमहायज्ञ का विधान बताया गया है। इसमें भूत यज्ञ और नृयज्ञ शामिल हैं। इसमें चींटियों, कुत्तों, गाय और पक्षियों के लिए भोजन का अंश निकाला जाता है। प्यासे और भूखे व्यक्ति को भोजन कराना। जब हम घर में थोड़ा ज्यादा खाना बनाते हैं, तभी हम प्रसन्न मन से पहली रोटी गाय को और अंतिम रोटी कुत्ते को निकाल पाते हैं। यदि खाना बिल्कुल नाप-तोल कर बनाया जाएगा, तो जीव-जंतुओं के लिए अंश निकालना बोझ लगने लगेगा, जो कि धार्मिक दृष्टि से शुभ नहीं है।

मां अन्नपूर्णा का आशीर्वाद
शास्त्रों के अनुसार, जिस घर की रसोई में भोजन की कमी नहीं होती और जहां से कोई भूखा नहीं जाता, वहां साक्षात माता अन्नपूर्णा और देवी लक्ष्मी का वास होता है। रसोई को घर का सबसे पवित्र स्थान माना गया है। ऐसी मान्यता है कि यदि भोजन बनाते समय मन में यह भाव रहे कि यह भोजन पर्याप्त है और इसमें सबका भला होगा तो वह भोजन अमृत समान हो जाता है। इसके विपरीत, गिन-गिन कर भोजन बनाना दरिद्रता और संकीर्ण मानसिकता का प्रतीक माना जाता है। भोजन की अधिकता उदार हृदय को दर्शाती है, जिससे घर की ऊर्जा सकारात्मक बनी रहती है।

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मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक पक्ष
शास्त्रों के साथ-साथ इसके कुछ व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक लाभ भी हैं जब थाली में पर्याप्त भोजन होता है और पतीले में थोड़ा शेष बचा होता है, तो भोजन करने वाले के मन में तृप्ति का भाव आता है। वहीं, यदि भोजन खत्म होने की कगार पर हो, तो व्यक्ति संकोचवश अपनी भूख मार लेता है, जिसे 'अतृप्ति' कहा जाता है। अतृप्त मन से किया गया भोजन स्वास्थ्य को लाभ नहीं पहुंचाता।

बरकत और समृद्धि का सिद्धांत
अध्यात्म में बरकत का अर्थ मात्रा से नहीं, बल्कि उस सकारात्मक प्रभाव से है जिससे कम भी ज्यादा लगने लगता है। जब हम थोड़ा ज्यादा खाना बनाते हैं, तो हमारे अवचेतन मन में यह संदेश जाता है कि हमारे पास पर्याप्त से अधिक है। यह प्रचुरता की मानसिकता जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी समृद्धि को आकर्षित करती है। इसके विपरीत, कमी की मानसिकता तनाव और अभाव को जन्म देती है।

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