Kashi Vishwanath Mandir : आमलकी एकादशी पर सजेगा काशी का दरबार, बराती बनेंगे काशीवासी

Edited By Updated: 23 Feb, 2026 01:55 PM

kashi vishwanath mandir

महाशिवरात्रि के ठीक बाद आने वाली रंगभरी एकादशी पर धर्मनगरी काशी एक अद्भुत उत्सव की साक्षी बन रही है। यह वह पावन दिन है जब बाबा विश्वनाथ अपनी अर्धांगिनी माता पार्वती का 'गौना' कराकर उन्हें पहली बार काशी लाते हैं।

Kashi Vishwanath Mandir : महाशिवरात्रि के ठीक बाद आने वाली रंगभरी एकादशी पर धर्मनगरी काशी एक अद्भुत उत्सव की साक्षी बन रही है। यह वह पावन दिन है जब बाबा विश्वनाथ अपनी अर्धांगिनी माता पार्वती का 'गौना' कराकर उन्हें पहली बार काशी लाते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही इन परंपराओं ने आज भी काशी के कण-कण को भक्ति और गुलाल के रंगों से सराबोर कर दिया है।

गौना उत्सव: जब भगवान बने दूल्हा
मान्यता है कि महाशिवरात्रि पर विवाह के बाद, माता पार्वती अपने मायके में रुकी थीं। रंगभरी एकादशी पर बाबा विश्वनाथ उन्हें विदा कराकर अपने घर (काशी) ले जाते हैं। इस अवसर पर बाबा की चल-प्रतिमा का विशेष राजसी श्रृंगार किया जाता है। उन्हें दूल्हे के रूप में सजाकर पालकी में बैठाया जाता है, जिसे देखने के लिए समूची काशी उमड़ पड़ती है।

पीढ़ियों से निभाई जा रही परंपराएं
बाबा की पालकी का प्रस्थान टेढ़ी नीम स्थित पूर्व महंत के आवास से होता है। यह परंपरा दशकों से एक ही परिवार द्वारा अटूट निष्ठा के साथ निभाई जा रही है। आम तौर पर होली फाल्गुन पूर्णिमा को खेली जाती है, लेकिन काशी में होली की शुरुआत इसी दिन से मानी जाती है। बाबा विश्वनाथ और माता पार्वती के स्वागत में भक्त हवा में 'अबीर' और 'गुलाल' उड़ाते हैं। कहा जाता है कि इस दिन बाबा स्वयं अपने भक्तों के साथ होली खेलते हैं। पालकी यात्रा के दौरान सैकड़ों की संख्या में डमरू वादक एक लय में डमरू बजाते हैं, जिससे पूरी काशी में एक अलौकिक ऊर्जा का संचार होता है।

अनोखा उत्सव: शिव और शक्ति का मिलन
रंगभरी एकादशी का यह पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के पुनर्मिलन का प्रतीक है। मंदिर के गर्भगृह से लेकर गलियों तक सिर्फ हर-हर महादेव के जयकारे और गुलाल की चादर दिखाई देती है। प्रशासन ने भी इस भीड़ को देखते हुए विशेष सुरक्षा और सुगम दर्शन की व्यवस्था की है।

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