मंदिर में भगवान की प्रसन्नता के लिए फूल-पत्ते चढ़ाने वालों का जीवन बदल देगी ये कहानी

Edited By Updated: 30 Sep, 2023 09:34 AM

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मेरे एक साथी ने अपनी यह कहानी सुनाई। उसने बताया, दस साल पहले की बात है, तब मैं आठवीं क्लास में पढ़ता था। मैं अपनी बुआ के घर गया था। गांव में था उनका

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Planting trees benefits: मेरे एक साथी ने अपनी यह कहानी सुनाई। उसने बताया, दस साल पहले की बात है, तब मैं आठवीं क्लास में पढ़ता था। मैं अपनी बुआ के घर गया था। गांव में था उनका घर। मैंने देखा कि सुबह-सुबह ही फूफा जी ने स्नान किया और रसोईघर में घुस गए। कुछ मीठा, खुशबूदार पकवान उन्होंने बनाया। मेरे पूछने पर फूफा जी ने बताया कि, ‘‘मंदिर में चढ़ाने के लिए प्रसाद बनाया है। यह प्रसाद मैं हमेशा स्वयं ही अपने हाथों से बनाता हूं।’’

मुझे आश्चर्य हुआ, पर मैं कुछ बोला नहीं। उनके पीछे-पीछे चल पड़ा। घर के पास ही एक पेड़ था। फूफा जी ने एक हाथ में प्रसाद की थाली पकड़ी, थोड़ी ऊंची जगह चढ़े और उस पेड़ के कई पत्ते तोड़कर थाली में रख लिए।

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मैंने पूछा, ‘‘आपने ये पत्ते किस लिए तोड़े हैं?’’

वह बोले, ‘‘तुम्हें कुछ नहीं पता। इन पत्तों को मैं भगवान की मूर्ति पर चढ़ाऊंगा।’’

‘‘फूफा जी, पेड़ आपने लगाया था?’’

‘‘हम क्यों लगाएंगे पेड़, यह तो माली का काम है। सामने वे झोपड़ियां देख रहे हो ? उनमें माली रहते हैं। उनमें से किसी ने लगाया होगा। पाला-पोसा होगा।’’

मैं उन दिनों नासमझ बालक ही माना जाता था इसलिए कह बैठा, ‘‘फूफा जी प्रसाद तो आप अपने हाथ से बना कर चढ़ाते हैं, पर पत्ते किसी और के लगाए पेड़ के चढ़ाते हैं। कितना अच्छा होता यदि आप अपने हाथ से पेड़ लगाते और उसके पत्ते तोड़ कर ले जाते।’’

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फूफा जी ने गुस्से में मेरी तरफ देखा। मेरा एक कान उमेठते हुए बोले, ‘‘बड़ों से इस तरह बात नहीं की जाती।’’

उस दिन की बात वहीं खत्म हो गई। मैं भी वहां एक सप्ताह रहकर वापस अपने माता-पिता के पास चला गया। आगे की पढ़ाई, प्रशिक्षण, नौकरी की तलाश में इतना व्यस्त हो गया कि बुआ के पास जाने का कभी समय ही नहीं मिला। बुआ के यहां से कई बार शिकायतें आईं कि मैंने तो उन्हें बिल्कुल भुला ही दिया है।

अभी कुछ दिन पहले बुआ के यहां जाकर आया हूं। पूरे दस साल बाद। वहां का तो नजारा ही बदल गया है। वह गांव-गांव न रहकर बड़ा कस्बा बन गया है। बुआ के घर के सामने की झोपड़ियों की जगह पक्के मकान बन गए थे। बुआ के घर के पास जहां पहले एक पेड़ था, अब वहां दो पेड़ थे। फूफा जी वैसे ही थे। उम्र बड़ी लगने लगी थी, पर पहले की तरह अपने हाथों से प्रसाद बनाते थे।
उस दिन जैसे ही वह प्रसाद के साथ मंदिर के लिए निकले, मैं उनके पीछे-पीछे चल पड़ा ? फूफा जी उन दोनों पेड़ों के पास से बिना पत्ते तोड़े आगे निकल गए। मुझे बड़ी हैरानी हुई। मैं तेजी से उनके पास पहुंचा और बोला, ‘‘आज आप पत्ते तोड़ना भूल गए हैं।’’

वह हल्के से हंसे और मेरे कंधे पर हाथ रख दिया। बोले, ‘‘चलो आज तुम भी मेरे साथ चलो।’’

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रास्ते में उन्होंने बताया, ‘‘दस  साल पहले तुमने मुझे पेड़ के पत्तों के बारे में एक बात कही थी। तुम्हें याद है या नहीं, मुझे नहीं पता। पर मुझे याद है।’’

‘‘फूफा जी मुझे याद क्यों नहीं होगी। उस दिन मेरी कही बात पर आपने मेरा कान उमेठा था, वह दर्द अब भी कभी-कभी होता है।’’

उन्होंने आगे बताया, ‘‘तुम्हारी बात पर उस दिन तो मुझे गुस्सा आया था, पर तुम्हारे जाने के बाद मैंने उस पर बार-बार सोचा और इस नतीजे पर पहुंचा कि मुझे एक पेड़ अपने हाथों से लगाना चाहिए। घर के पास जो दूसरा पेड़ है, वह मैंने अपने हाथों से लगाया है। उसे पाल-पोस कर इतना बड़ा किया है।’’

‘‘तो आपने अपने हाथों से लगाए इस पेड़ के पत्ते क्यों नहीं तोड़े?’’

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‘‘अब मैंने पूजा के लिए पेड़ के पत्ते तोड़ना बंद कर दिया है। अपने हाथ से लगाए पेड़ के पत्ते तोड़ते समय दुख महसूस होने लगा था। एक बात और थी...।’’

‘‘क्या?’’

‘‘जब भी मैं किसी पेड़ के पत्ते तोड़ने के लिए उसे हाथ लगाता, मुझे लगता, मैं तुम्हारा कान उमेठ रहा हूं।’’ कहकर वह हंसे और धीरे से मेरा कान पकड़कर हिला दिया।

‘‘वाह फूफा जी, आज आपने इस तरह मेरा कान पड़कर दस साल पुराना दर्द दूर कर दिया है।’’    

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