Edited By Niyati Bhandari,Updated: 12 Jan, 2026 02:11 PM

ShaktiPeeth In Bengal: प्राचीन बंगभूमि, जिसमें वर्तमान का बंगलादेश भी सम्मिलित है, प्राचीन समय से ही यह भूमि शक्ति उपासना का विशिष्ट केंद्र रही है। दुर्गा पूजा का यहां सबसे बड़ा उत्सव मनाया जाता है। इस क्षेत्र में 14 शक्तिपीठ स्थित हैं।
ShaktiPeeth In Bengal: प्राचीन बंगभूमि, जिसमें वर्तमान का बंगलादेश भी सम्मिलित है, प्राचीन समय से ही यह भूमि शक्ति उपासना का विशिष्ट केंद्र रही है। दुर्गा पूजा का यहां सबसे बड़ा उत्सव मनाया जाता है। इस क्षेत्र में 14 शक्तिपीठ स्थित हैं।

1. किरीट कात्यायनी शक्तिपीठ: किरीट यानी मुकुट या शिरआभूषण। इस जगह सती माता का किरीट गिरा था, इसलिए इसे किरीट कात्यायनी शक्ति पीठ कहा जाता है। यहां की शक्ति विमला या भुवनेश्वरी है। भैरव संवर्त हैं।
कहां है मंदिर- यह शक्तिपीठ हावड़ा बाहरवा रेलवे लाइन पर हावड़ा से अढ़ाई किलोमीटर दूर लालबाग कोट स्टेशन से लगभग 5 कि.मी. की दूरी पर स्थित है।
2. युगाद्या शक्तिपीठ: यहां देवी के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था। यहां की शक्ति भूतधात्री है और भैरव क्षीरकण्टक है। त्रेता युग में महिरावण ने पाताल में जिस काली की उपासना की थी, वह युगाद्या ही थीं।
कहा जाता है कि महिरावण की कैद से छुड़ाकर राम-लक्ष्मण को पाताल से लेकर लौटते हुए हनुमान जी देवी को भी अपने साथ लाए और क्षीरग्राम में उन्हें स्थापित किया। क्षीरग्राम की भूतधात्री महामाया के साथ देवी युगाद्या की भद्रकाली मूर्ति एक हो गई और देवी का नाम योगाद्या या युगाद्या हो गया।
कहां है मंदिर- पूर्वी रेलवे के बर्दवान जंक्शन से लगभग 32 कि.मी. उत्तर की ओर क्षीरग्राम में यह शक्तिपीठ स्थित है।
3. त्रिस्त्रोता शक्तिपीठ: यहां सती माता का वाम या उल्टा पैर गिरा था। यहां की शक्ति भ्रामरी और भैरव ईश्वर हैं।
कहां है मंदिर- पूर्वोतर रेलवे में सिलीगुड़ी-हल्दीवाड़ी रेलवे-लाइन पर जलपाइगुड़ी स्टेशन है। यह जिला मुख्यालय भी है। इस जिले के बोदा इलाके में शलवाड़ी ग्राम है। यहां तीस्ता नदी के किनारे माता का मंदिर है।
4. बहुला शक्तिपीठ : पौराणिक कथा के अनुसार बहुला शक्तिपीठ वह जगह है, जहां पर देवी मां की बाईं भुजा गिरी थी। इस मंदिर के निर्माण और उत्थान को लेकर वैसे कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है।
कहां है मंदिर- पश्चिम बंगाल के हावड़ा से यह 145 कि.मी. दूरी पर स्थित है। बहुला शक्तिपीठ को भारत के ऐतिहासिक स्थलों में से एक माना जाता है। यहां पर हिंदू भक्तों को देवी शक्ति के रूप का दर्शन कर अद्वितीय ईश्वरीय ऊर्जा की अनुभूति होती है।
5. वक्त्रेश्वर शक्तिपीठ : यहां का मुख्य मंदिर वक्त्रेश्वर शिव मंदिर है। इसी स्थान पर सती का मन गिरा था। यहां शक्ति को महिषासुरमर्दिर्नी और भैरव को वक्त्रनाथ कहा जाता है। किंवदंती यह भी है कि यहीं पर महर्षि कहोड के पुत्र अष्टावक्र का आश्रम भी था।
कहां है मंदिर- यह मंदिर सैंथिया जंक्शन से 12 कि.मी. की दूरी पर शमशान भूमि पर स्थित है। बाकेश्वर नाले के किनारे पर स्थित होने के कारण इसे बाकेश्वर या वक्त्रेश्वर कहा जाता है। इस स्थान पर अनेक तप्त झरने हैं, जो यहां के सौंदर्य में वृद्धि करते हैं।
6. नलहटी शक्तिपीठ- कहते हैं यहां माता सती की उदर नली का पतन हुआ था। शक्ति कालिका और भैरव योगीश हैं।
कहां है मंदिर : यह शक्तिपीठ बोलपुर शांति निकेतन से 75 कि.मी. और सैन्थिया जंक्शन से मात्र 42 कि.मी दूर नलहटी रेलवे स्टेशन से 3 कि.मी. की दूरी पर है।
7. करतोयातट शक्तिपीठ : इस जगह सती माता की देह से बांई पायल गिरी थी। यहां कि शक्ति अपर्णा और भैरव वामन है।
कहां है मंदिर : बंगलादेश के शेरपुर बागुरा स्टेशन से 28 कि.मी. दूर भवानीपुर गांव के पार करतोया तट पर माता की पायल गिरी थी।
8. विभाष शक्तिपीठ: यहां माता सती का बायां टखना गिरा था। शक्ति कपालिनी या भीमरूपा है और भैरव सर्वानंद है।
कहां है मंदिर- यह मंदिर पश्चिम बंगाल में मिदनापुर जिले के ताम्रलुक में है। वहां रूपनारायण नदी के तट पर वर्गभीमा का विशाल मंदिर ही यह शक्तिपीठ है। दक्षिण-पूर्व रेलवे के कुड़ा स्टेशन से 24 कि.मी. की दूरी पर यह स्थान है।
9. नंदीपुुर शक्तिपीठ: मान्यता है कि इस स्थान पर सती माता के गले का हार गिरा था। यहां की शक्ति नंदिनी और भैरव नंदीकेश्वर हैं।
कहां स्थित है- सैंथिया स्टेशन से थोड़ी दूर पर नंदीपुर नामक स्थान में एक बड़े वट वृक्ष के नीचे यह देव मंदिर स्थित है।
10. अट्टहास शक्तिपीठ: इस स्थान पर देवी का अध ओष्ट यानी नीचे वाला होंठ गिरा था। यहां की शक्ति फुल्लरा और भैरव विश्वेश है।
कहां है मंदिर- यह शक्तिपीठ वर्धमान या बर्दवान से 93 कि.मी. दूर कटवा-अहमदपुर लाइन पर लाबपुर स्टेशन के पास है।
11. यशोर शक्तिपीठ: यहां देवी की वाम हथेली यानी उल्टे हाथ की हथेली गिरी थी। शक्ति यशोरेश्वरी और भैरव चंद्र है। इसी का पुराना नाम यशोर (यशोदर) है। यहीं पर देवी यशोरेश्वरी नाम से विराजमान हैं।
कहां है मंदिर : यह शक्तिपीठ वर्तमान में बंगलादेश में खुलना जिले के जैशोरे शहर में स्थित है।
12. चट्टल: यहां माता सती का दक्षिण बाहु गिरा था। शक्ति भवानी और भैरव चंद्रशेखर है। चंद्रशेखर शिव का भी यहां मंदिर है। इस मंदिर से सीताकुंड, व्यासकुंड, सूर्यकुंड, ब्रहकुंड, जनकोटिशिव, सहस्त्रधारा, बाडवकुंड और लवणाक्ष तीर्थ पास ही हैं। यहां हर शिवरात्रि को मेला लगता है।
कहां है मंदिर- यह चटगांव से 38 कि.मी. दूर सीताकुंड स्टेशन के पास चंद्रशेखर पर्वत पर यह भवानी मंदिर स्थित है।
13. सुगंधा शक्तिपीठ: मान्यता है कि इस स्थान पर माता सती की नासिका गिरी थी। यहां कि शक्ति सुनंदा और भैरव त्र्यम्बक हैं।
कहां है मंदिर- यह शक्तिपीठ बंगलादेश में स्थित है। यहां पहुंचने के लिए बरीसाल तक स्टीमर से जाया जा सकता है। वहां से 21 कि.मी. उत्तर में शिकारपुर ग्राम है। वहीं सुगंधा नदी के तट पर मंदिर स्थित है। इस मंदिर को उग्रतारा मंदिर के नाम से जाना जाता है।
14. कालिका शक्तिपीठ : कोलकाता के कालीघाट स्थित कालिका देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में सर्वप्रसिद्ध शक्तिपीठ होने के साथ-साथ हिंदुओं का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। इस मंदिर की वहीं मान्यताएं हैं, जो काशी में श्रीविश्वनाथ मंदिर की हैं। यहां माता के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था और माता यहां शक्ति रूप में स्थापित हो गईं। माता सती यहां कालिका रूप में हैं, जबकि स्वयंभू नकुलेश्वर भैरव रूप में प्रतिष्ठित हैं। चार महाशक्तिपीठों में से एक कालिका देवी मंदिर में माता अपने उस प्रचंड रूप में हैं, जिसमें उन्होंने भगवान शिव के सीने पर पैर रखकर नरमुंडों की माला पहनी हुई हैं।
कहां है मंदिर- मंदिर कोलकता में हुगली नदी के तट पर स्थित है। कोलकता में इसके अलावा भी कई प्रसिद्ध देवी मंदिर है।
