ऐसा मंदिर लाता है Good luck, क्या आपके घर में है ?

Edited By Updated: 27 Dec, 2019 07:23 AM

such a temple brings good luck

पूजा का कमरा पूरे घर के लिए ऊर्जा का स्रोत होता है। पूजा के कमरे के लिए वास्तु से संबंधित सुझावों का पालन करने से घर और वहां रहने वालों के लिए सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव और ज्यादा बढ़ जाता है लेकिन

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पूजा का कमरा पूरे घर के लिए ऊर्जा का स्रोत होता है। पूजा के कमरे के लिए वास्तु से संबंधित सुझावों का पालन करने से घर और वहां रहने वालों के लिए सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव और ज्यादा बढ़ जाता है लेकिन घर में पूजा घर या देवी-देवताओं की मूर्तियां लगाते समय अनजाने में और पर्याप्त ज्ञान के अभाव में छोटी-मोटी गलतियां हो जाती हैं, जिससे हमें कई बार परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में वास्तु शास्त्र के अनुसार पूजा घर का निर्माण जरूरी होता है।

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पूजा घर का आकार
पूजा स्थल के लिए भवन का उत्तर पूर्व कोना सबसे उत्तम होता है। पूजा स्थल की भूमि उत्तर पूर्व की ओर झुकी हुई और दक्षिण-पश्चिम से ऊंची हो, आकार में चौकोर या गोल हो तो सर्वोत्तम होती है। मंदिर की ऊंचाई उसकी चौड़ाई से दोगुनी होनी चाहिए। मंदिर के परिसर का फैलाव ऊंचाई से 1/3 होना चाहिए।

पूजा घर को ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में स्थापित करने से ज्ञान की वृद्धि तथा आत्मा की शुद्धि होती है। पूजा घर के दरवाजे दो पल्ले वाले होने चाहिएं।

पूजा गृह के द्वार पर दहलीज जरूर बनवानी चाहिए। पूजा घर का द्वार टिन या लोहे की ग्रिल का नहीं होना चाहिए। पूजा घर का रंग सफेद या हल्का क्रीम होना चाहिए।

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मूर्ति और प्राण-प्रतिष्ठा
मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा उस देवता के प्रमुख दिन पर ही करें या जब चंद्र पूर्ण हो अर्थात 5, 10, 15 तिथि को ही मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा करें। घर में बैठे हुए गणेश जी की प्रतिमा ही रखनी चाहिए। गणेश जी की स्थापना कभी पूर्व या पश्चिम दिशा में नहीं करनी चाहिए। गणेश जी का मुख सदैव उत्तर दिशा की तरफ रखना चाहिए। गणेश जी की स्थापना के लिए सही दिशा दक्षिण है। हनुमान जी की मूर्ति या तस्वीर को उत्तर दिशा में स्थापित करना चाहिए, जिससे उनकी दृष्टि दक्षिण दिशा में रहे। पूजा घर मेंं  देवी-देवताओं की प्रतिमा या चित्र पूर्व या उत्तर दिशा की ओर दीवार के पास रखनी चाहिए। घर में कुलदेवता का चित्र होना अत्यंत शुभ है। इसे पूर्व या उत्तर की दीवार पर लगाना श्रेष्ठ कर है। पूजा के कमरे में दीपक रखने की जगह हवन कुंड या यज्ञवेदी दक्षिण-पूर्व दिशा में होनी चाहिए। पूजा घर में मंदिर को इस तरह से व्यवस्थित करना चाहिए कि जातक का मुख दक्षिण दिशा की ओर न हो। पूजा घर के अंदर कोई भी खंडित (टूटी-फूटी) मूर्ति या तस्वीर नहीं रखनी चाहिए। मूर्तियों का आकार भी कम से कम होना चाहिए।

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इन बातों से बचें-
उग्र देवता की स्थापना घर में न करें।

घर में एक बित्ते से अधिक बड़ी पत्थर की मूर्ति की स्थापना करने से गृहस्वामी की संतान नहीं होती, उसकी स्थापना पूजा स्थान में ही करनी चाहिए।

रसोईघर, शौचालय, पूजा घर एक-दूसरे के पास न बनाएं। घर में सीढिय़ों के नीचे पूजा घर नहीं होना चाहिए।

शयनकक्ष में पूजा स्थल नहीं होना चाहिए। अगर जगह की कमी के कारण मंदिर शयनकक्ष में बना हो तो मंदिर के चारों ओर पर्दे लगा दें। इसके अलावा शयनकक्ष के उत्तर पूर्व दिशा में पूजा स्थल होना चाहिए। सोते समय जातक के पांव मंदिर की तरफ नहीं होने चाहिएं।

मूर्ति के आमने-सामने पूजा के दौरान कभी नहीं बैठना चाहिए, बल्कि सदैव दाएं कोण में बैठना उत्तम होगा।

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भूल से भी भगवान की तस्वीर या मूर्ति आदि नैऋत्य कोण में न रखें, इससे बनते कार्यों में रुकावटें आती हैं।

पूजा स्थल में भगवान या मूर्ति का मुख पूर्व या पश्चिम की तरफ होना चाहिए और उत्तर दिशा की ओर नहीं होना चाहिए क्योंकि ऐसी दशा में उपासक दक्षिणामुख होकर पूजा करेगा, जोकि उचित नहीं है।

पूजन कक्ष में मृतात्माओं का चित्र वर्जित है।

किसी भी श्री देवता की टूटी-फूटी मूर्ति या तस्वीर व सौंदर्य प्रसाधन का सामान, झाड़ू व अनावश्यक सामान न रखें।

सफाई करते समय अगर मंदिर या पूजा स्थल से कोई सामान हटाना हो तो उसे नदी या जल में प्रवाहित कर दें, ऐसी वस्तुओं को घर में दोबारा कहीं और न रखें।

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वास्तु टिप्स: यह सच है कि ईश्वर सर्वव्यापी हैं और वह हमेशा सबका कल्याण ही करेंगे लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि दिशाओं के स्वामी भी देवता ही हैं, इसलिए हर घर में पूजा-पाठ करने का स्थान अवश्य ही होना चाहिए लेकिन घर में मंदिर या पूजा पाठ के लिए स्थान बनवाते या घर के पूजा स्थल में देवी-देवताओं की मूर्ति स्थापित करते समय कई सावधानियां बरतनी चाहिएं। पूजा स्थल बनवाते समय भी वास्तु के नियमों का ध्यान रख कर हम परेशानियों से बच सकते हैं।

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