Drug Prices Cut: दवाइयों की कीमतों में बड़ा बदलाव, 30% सस्ती होंगी मेडिसिन, फार्मा कंपनियों पर कसेगा शिकंजा!

Edited By Updated: 12 May, 2025 07:45 AM

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अमेरिका में आम नागरिकों को राहत देने के इरादे से पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा कदम उठाने की घोषणा की है। उन्होंने रविवार को बताया कि वे प्रिस्क्रिप्शन दवाओं और फार्मास्युटिकल उत्पादों की कीमतों को 30% तक कम करने के लिए एक कार्यकारी आदेश...

नेशनल डेस्क: अमेरिका में आम नागरिकों को राहत देने के इरादे से पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा कदम उठाने की घोषणा की है। उन्होंने रविवार को बताया कि वे प्रिस्क्रिप्शन दवाओं और फार्मास्युटिकल उत्पादों की कीमतों को 30% तक कम करने के लिए एक कार्यकारी आदेश (Executive Order) पर हस्ताक्षर करने जा रहे हैं। ट्रंप का यह फैसला अमेरिका की हेल्थकेयर प्रणाली में लंबे समय से चल रही मूल्य असमानता को चुनौती देता नजर आ रहा है।

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर इस निर्णय का खुलासा करते हुए लिखा कि, "मैं कई वर्षों से देख रहा हूं कि अमेरिका में प्रिस्क्रिप्शन ड्रग्स की कीमतें बाकी देशों की तुलना में कई गुना ज्यादा हैं।" उन्होंने सवाल उठाया कि, "आखिर क्यों एक ही दवा, जो एक ही प्रयोगशाला या प्लांट में बनी है, अमेरिका में 5 से 10 गुना महंगी बिकती है?"

दवा कंपनियों पर सीधा निशाना
ट्रंप ने दवा कंपनियों पर निशाना साधते हुए कहा कि वे रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट को बहाना बनाकर कीमतें बढ़ा देती हैं। लेकिन अब अमेरिका में इन दवाओं की लागत को नियंत्रित करने का समय आ गया है। उन्होंने कहा कि इस कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर होते ही दवाइयों की कीमतों में तत्काल कमी आएगी।

अमेरिका में राहत, दुनिया में असर?
हालांकि ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका में दवाओं को सस्ता करने का यह कदम ग्लोबल मार्केट पर भी असर डालेगा। उन्होंने कहा कि जब अमेरिका में दवाएं सस्ती होंगी, तो संभव है कि बाकी दुनिया में प्रिस्क्रिप्शन दवाओं की कीमतें बढ़ जाएं।

क्यों है यह फैसला अहम?
ट्रंप का यह कदम न सिर्फ चुनावी रणनीति के लिहाज से अहम है, बल्कि यह उन करोड़ों अमेरिकियों के लिए राहत भरा साबित हो सकता है, जो हर महीने भारी मेडिकल बिलों का सामना करते हैं। अमेरिकी हेल्थकेयर सिस्टम में दवाओं की ऊंची कीमतें लंबे समय से एक गंभीर मुद्दा बनी हुई हैं, जिस पर अब तक कई सरकारें कड़े निर्णय लेने से बचती रहीं हैं।

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