Edited By Parveen Kumar,Updated: 20 Mar, 2026 09:06 PM

बदलते मौसम का असर अब केवल तापमान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह लोगों की दिनचर्या और सेहत को भी प्रभावित कर रहा है। पहले जहां मौसम संतुलित हुआ करता था और सर्दी, गर्मी व बारिश का स्पष्ट चक्र देखने को मिलता था, वहीं अब साल के ज्यादातर समय गर्मी का असर...
नेशनल डेस्क : बदलते मौसम का असर अब केवल तापमान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह लोगों की दिनचर्या और सेहत को भी प्रभावित कर रहा है। पहले जहां मौसम संतुलित हुआ करता था और सर्दी, गर्मी व बारिश का स्पष्ट चक्र देखने को मिलता था, वहीं अब साल के ज्यादातर समय गर्मी का असर बना रहता है। इस बदलाव ने लोगों की शारीरिक गतिविधियों को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है।
हाल ही में प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित एक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि बढ़ते तापमान के कारण आने वाले वर्षों में करोड़ों लोग शारीरिक रूप से निष्क्रिय हो सकते हैं। खासकर भारत जैसे गर्म जलवायु वाले देशों में इसका प्रभाव ज्यादा गंभीर हो सकता है।
तापमान बढ़ते ही घटती है सक्रियता
रिपोर्ट में 156 देशों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन के अनुसार, जब किसी क्षेत्र का औसत मासिक तापमान 27.8 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाता है, तो लोगों की शारीरिक गतिविधियां स्वतः कम होने लगती हैं। गर्मी और उमस के कारण लोग बाहर निकलने और व्यायाम करने से बचते हैं।
भारत के लिए बढ़ती चिंता
विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2050 तक भारत में शारीरिक निष्क्रियता के मामलों में करीब 2 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। इसका मतलब है कि लोग टहलने, दौड़ने या अन्य शारीरिक गतिविधियों से दूरी बना सकते हैं, जिससे जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ेगा। भारत में गर्मी और नमी के बढ़ते स्तर, साथ ही सीमित संसाधन, इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं। दिन के समय बाहर निकलना मुश्किल होता जा रहा है, जिससे फिटनेस से जुड़ी आदतों पर असर पड़ रहा है।
शहरीकरण ने बढ़ाई समस्या
शहरों में तेजी से बढ़ते कंक्रीट ढांचे और हरित क्षेत्रों की कमी ने तापमान को और अधिक बढ़ा दिया है। पार्क, पेड़-पौधों और खुले स्थानों की कमी के कारण लोगों के पास सुरक्षित और ठंडे वातावरण में एक्सरसाइज करने के विकल्प कम होते जा रहे हैं।
बीमारियों का खतरा बढ़ेगा
डॉक्टरों का कहना है कि शारीरिक गतिविधि में कमी से गैर-संचारी रोगों (NCDs) का खतरा तेजी से बढ़ सकता है। इनमें हृदय रोग, टाइप-2 डायबिटीज, कैंसर और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं शामिल हैं। अध्ययन के अनुसार, भारत में शारीरिक निष्क्रियता के कारण प्रति एक लाख आबादी पर करीब 10 से अधिक मौतों का जोखिम बढ़ सकता है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव के साथ-साथ आर्थिक नुकसान भी हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि शारीरिक सक्रियता को अब केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं, बल्कि जरूरी आदत के रूप में अपनाना होगा।