Electricity Bill: बिजली उपभोक्ताओं को बड़ा झटका! 2026-27 से बदल जाएगा पूरा सिस्टम, हर साल अपने आप बढ़ेंगे बिजली बिल

Edited By Updated: 23 Jan, 2026 09:59 AM

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बिजली का स्विच ऑन करते ही जेब पर असर महसूस होने वाला दौर अब दूर नहीं लगता। केंद्र सरकार की प्रस्तावित नई राष्ट्रीय विद्युत नीति ने संकेत दे दिए हैं कि आने वाले वर्षों में बिजली सस्ती रहने की उम्मीद करना मुश्किल हो सकता है।

नेशनल डेस्क: बिजली का स्विच ऑन करते ही जेब पर असर महसूस होने वाला दौर अब दूर नहीं लगता। केंद्र सरकार की प्रस्तावित नई राष्ट्रीय विद्युत नीति ने संकेत दे दिए हैं कि आने वाले वर्षों में बिजली सस्ती रहने की उम्मीद करना मुश्किल हो सकता है।

सरकार द्वारा जारी राष्ट्रीय विद्युत नीति (NEP) के मसौदे ने बिजली दरों को लेकर देशभर में नई बहस छेड़ दी है। अगर यह नीति लागू होती है, तो 2026-27 से बिजली के दाम हर साल अपने आप बढ़ सकते हैं। अब तक कई राज्यों में राजनीतिक कारणों से लंबे समय तक टैरिफ नहीं बढ़ाए जाते थे, लेकिन नई नीति इस चलन को खत्म करने की दिशा में बढ़ती दिखाई दे रही है।

मसौदे में Index-Linked Tariff  व्यवस्था का प्रस्ताव रखा गया है। इसके तहत अगर राज्य विद्युत नियामक आयोग तय समय पर नई दरों का ऐलान नहीं करते हैं, तो पहले से तय फॉर्मूले के अनुसार बिजली की कीमतों में स्वतः वृद्धि हो जाएगी। इसका मतलब यह है कि बिजली के दाम अब सिर्फ राजनीतिक फैसलों पर निर्भर नहीं रहेंगे।

सरकार की चिंता की बड़ी वजह बिजली वितरण कंपनियों की बिगड़ती वित्तीय स्थिति है। देशभर की डिस्कॉम पर करीब 3 लाख करोड़ रुपये का बकाया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2023 में बिजली कंपनियों को प्रति यूनिट औसतन 50 पैसे का नुकसान हुआ। उत्पादन और आपूर्ति की लागत के मुकाबले कम वसूली ने इस संकट को और गहरा किया है।

इस बीच बिजली क्षेत्र से जुड़ा एक अहम विधेयक संसद के आगामी बजट सत्र में पेश किया जा सकता है। बिजली (संशोधन) विधेयक के मसौदे में यह सुझाव भी शामिल है कि डिस्कॉम द्वारा बिजली खरीदने की लागत में होने वाले बदलाव की जानकारी हर महीने उपभोक्ताओं को दी जाए। सरकार ने इस ड्राफ्ट नीति पर सभी संबंधित पक्षों से 30 दिनों के भीतर सुझाव मांगे हैं।

नई नीति के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 से नियामक आयोगों को ऐसी दरें तय करनी होंगी, जिससे बिजली उत्पादन से लेकर उपभोक्ता तक पहुंचाने की पूरी लागत उसी समय वसूल की जा सके। बाद में घाटा जोड़कर या अचानक शुल्क बढ़ाने की व्यवस्था को खत्म करने की बात कही गई है। साथ ही बिजली की कीमतों को महंगाई जैसे किसी सूचकांक से जोड़ने का प्रस्ताव भी रखा गया है।

भारत में उद्योगों को पहले से ही दुनिया की सबसे महंगी बिजली में से एक खरीदनी पड़ती है। इसका कारण यह है कि किसानों और घरेलू उपभोक्ताओं को दी जाने वाली सस्ती या सब्सिडी वाली बिजली का बोझ उद्योगों पर डाल दिया जाता है। देश की लगभग 45 प्रतिशत बिजली खपत इन्हीं दो वर्गों में होती है।

अगर नई व्यवस्था लागू होती है, तो इसका सीधा असर घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं पर भी पड़ेगा। सब्सिडी और वास्तविक लागत के बीच का अंतर धीरे-धीरे कम करने की योजना है। इसका मतलब यह हुआ कि आने वाले समय में बिजली का बिल अचानक नहीं, बल्कि हर महीने थोड़ा-थोड़ा बढ़ता हुआ महसूस हो सकता है।

 

 

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