Edited By Anu Malhotra,Updated: 13 Mar, 2026 11:39 AM

Middle East (पश्चिम एशिया) में बढ़ता तनाव आज केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसने वैश्विक अर्थव्यवस्था की जड़ों को हिला दिया है। पिछले दो हफ्तों से जारी इस संघर्ष में न तो ईरान और न ही अमेरिका या इजराइल की ओर से पीछे हटने के संकेत मिल...
Middle East (पश्चिम एशिया) में बढ़ता तनाव आज केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसने वैश्विक अर्थव्यवस्था की जड़ों को हिला दिया है। पिछले दो हफ्तों से जारी इस संघर्ष में न तो ईरान और न ही अमेरिका या इजराइल की ओर से पीछे हटने के संकेत मिल रहे हैं। इस अनिश्चितता का सबसे बड़ा झटका कच्चे तेल की कीमतों को लगा है, जो एक बार फिर $100 प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर चुकी हैं। भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि हम अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करते हैं।
ऊर्जा संकट और उद्योगों पर तालाबंदी का खतरा
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz), जो वैश्विक तेल और गैस व्यापार की लाइफलाइन है, वहां तनाव होने से सप्लाई चेन पूरी तरह बाधित हो गई है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 80% तेल और गैस बाहर से मंगाता है। इसका नतीजा यह है कि फर्टिलाइजर प्लांट से लेकर टाइल्स फैक्ट्रियों तक, हर जगह गैस की किल्लत हो गई है। यहाँ तक कि रेस्टोरेंट उद्योग भी इसकी चपेट में है; 'नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया' ने तो अपने सदस्यों को मेनू छोटा करने और बिजली के उपकरणों पर निर्भरता बढ़ाने जैसी सलाह तक दे डाली है ताकि काम चलता रहे।
अंतिम संस्कार की व्यवस्था में बदलाव
हैरानी की बात यह है कि गैस की इस कमी ने श्मशान घाटों तक को प्रभावित किया है। LPG की भारी किल्लत के कारण कई शहरों में गैस आधारित शवदाह गृहों (Gas Crematoriums) को बंद करना पड़ा है। इसके विकल्प के रूप में लोग अब वापस पारंपरिक लकड़ियों के इस्तेमाल पर मजबूर हो रहे हैं, जो न केवल असुविधाजनक है बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी चुनौतीपूर्ण है।
हवाई सफर हुआ महंगा और रूट हुए बाधित
मिडल ईस्ट के ऊपर से गुजरने वाली उड़ानों के लिए जोखिम बढ़ गया है, जिससे विमानन कंपनियों का बीमा प्रीमियम (Insurance) काफी बढ़ गया है। जेट ईंधन (ATF) की कीमतों में लगी आग ने हवाई किराए को आम आदमी की पहुंच से दूर करना शुरू कर दिया है। युद्ध के कारण अब तक वैश्विक स्तर पर लगभग 46,000 उड़ानें रद्द हो चुकी हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय यात्रा और पर्यटन बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
सोना-चांदी की कीमतों का अजीब व्यवहार
आमतौर पर युद्ध के समय लोग सोने को सबसे सुरक्षित निवेश मानकर इसमें पैसा लगाते हैं, जिससे कीमतें बढ़ती हैं। लेकिन इस बार कहानी थोड़ी अलग है। तेल महंगा होने से वैश्विक महंगाई बढ़ने का डर है। ऐसे में अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम हो गई है, जिससे डॉलर मजबूत हो रहा है। गोल्डमैन सैक्स जैसी संस्थाओं का मानना है कि अब सितंबर से पहले ब्याज दरों में कटौती मुश्किल है। इसी मजबूत डॉलर के दबाव की वजह से फिलहाल सोने-चांदी की कीमतों में गिरावट देखी जा रही है।
भारत के 'विकसित राष्ट्र' के सपने पर असर
भारत ने साल 2047 तक एक विकसित अर्थव्यवस्था बनने का जो लक्ष्य रखा है, उसके लिए हमें सालाना 8 से 11 प्रतिशत की जीडीपी ग्रोथ चाहिए। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें $100 के आसपास टिकी रहीं, तो भारत की जीडीपी ग्रोथ में करीब 0.60% (60 बेसिस प्वाइंट) की गिरावट आ सकती है। यह गिरावट आर्थिक विकास की रफ्तार को धीमा कर सकती है, जिससे रोजगार और निवेश दोनों पर नकारात्मक असर पड़ेगा।