सबरीमाला विवाद पर थरूर ने LDF सरकार को घेरा, कहा- जनता की भावनाओं की अनदेखी कर सीखा बड़ा सबक

Edited By Updated: 07 Apr, 2026 05:16 PM

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कांग्रेस नेता शशि थरूर ने शबरिमला में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे और इससे संबंधित विवाद से सीखे गये सबक पर मंगलवार को कहा कि कानून की व्याख्या करने वालों को आस्था को ध्यान में रखना चाहिए। तिरूवनंतपुरम के सांसद ने यहां मीडिया से बात करते हुए कहा कि...

नेशनल डेस्क: कांग्रेस नेता शशि थरूर ने शबरिमला में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे और इससे संबंधित विवाद से सीखे गये सबक पर मंगलवार को कहा कि कानून की व्याख्या करने वालों को आस्था को ध्यान में रखना चाहिए। तिरूवनंतपुरम के सांसद ने यहां मीडिया से बात करते हुए कहा कि उन्होंने इस मुद्दे पर पहले भी विस्तार से लिखा है। उन्होंने लोगों से उनके विचार पढ़ने का आग्रह किया। शबरिमला मंदिर में मासिक धर्म के आयु वर्ग वाली महिलाओं के प्रवेश को लेकर हुए विवाद का जिक्र करते हुए थरूर ने कहा कि केरल की वामपंथी सरकार को अपनी गलती का एहसास हो गया है। उन्होंने कहा, ''एलडीएफ (वाम लोकतांत्रिक मोर्चा) सरकार ने जो सबसे महत्वपूर्ण सबक सीखा है, उनमें से एक यह है कि आप जनता की इच्छाओं और आस्थाओं को ध्यान में रखे बिना और सोच-विचार किये बिना कार्रवाई नहीं कर सकते।'' कांग्रेस सांसद ने इस बात पर जोर दिया कि संविधान और न्यायालयों का सम्मान करना आवश्यक है, लेकिन वे एक ऐसे समाज में कार्य करते हैं जो गहरी मान्यताओं से आकार लेता है। उन्होंने कहा, ''हम सभी संविधान के पक्षधर हैं। हम सभी उच्चतम न्यायालय का सम्मान करते हैं। लेकिन संविधान और न्यायालय एक ऐसे समाज की सेवा करते हैं, जहां लोगों की आस्था काफी गहरी होती है।''

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शबरिमला मंदिर की परंपरा को समझाते हुए थरूर ने कहा, ''जैसा कि हम सभी जानते हैं, शबरिमला में भगवान अय्यप्पा नित्य ब्रह्मचारी हैं, और उन्होंने माहवारी आयु वर्ग वाली किसी भी महिला पर उनकी नजर नहीं पड़े, इसके लिए उस वन मंदिर में शरण ली।'' उन्होंने कहा, ''और यही कारण है कि सदियों से यह परंपरा रही है कि 50 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं को आमतौर पर मंदिर के गर्भगृह या मंदिर परिसर में प्रवेश नहीं करने दिया जाता है। और सभी श्रद्धालु इस परंपरा का सम्मान करते आए हैं।'' थरूर ने कहा, ''अब, आप इस मान्यता पर बहस कर सकते हैं और कह सकते हैं कि मान्यता एक चीज या दूसरी चीज है। लेकिन सच्चाई यह है कि आस्था के मापदंड हमेशा अलग-अलग रहे हैं क्योंकि आस्था मान्यता पर आधारित होती है, कानून पर नहीं।'' अपनी मूल बात को दोहराते हुए थरूर ने कहा, ''जो लोग वास्तव में आस्था के संदर्भ में कानून की व्याख्या कर रहे हैं, उन्हें लोगों की आस्था को समझना और उसका सम्मान करना होगा।'' उन्होंने उच्चतम न्यायालय के 2018 के फैसले के बाद की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा, ''एलडीएफ ने लोगों की आस्था की उपेक्षा करके और फैसले को लागू करने की कोशिश कर एक बहुत बड़ा सबक सीखा।'' थरूर ने उल्लेख किया कि व्याहारिक रूप से ''उस निर्णय को कई साल से लागू नहीं किया गया है।''

राज्य सरकार के रुख में बदलाव का स्वागत करते हुए कांग्रेस सांसद ने कहा, ''एलडीएफ ने अपना रुख बदल लिया... कि परंपरा का अवश्य ही सम्मान किया जाना चाहिए। हम इसका स्वागत करते हैं।'' उन्होंने कहा कि इस तरह के मामलों में बदलाव क्रमिक होना चाहिए। थरूर ने कहा, ''यदि परिवर्तन आना है, तो वह लोगों के माध्यम से आएगा, न कि न्यायाधीशों या मुख्यमंत्रियों द्वारा थोपे जाने से।'' उन्होंने कहा कि शीर्ष न्यायालय के फैसले को जबरदस्ती लागू करने की कोशिश करने वाली सरकार को माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने कहा, ''2018 और 2019 के अपने बर्ताव के लिए उसे जनता से माफी मांगनी चाहिए।'' थरूर की ये टिप्पणियां ऐसे समय में आई हैं जब न्यायालय ने आस्था के अन्य मामलों के साथ-साथ शबरिमला मामले की सुनवाई फिर से शुरू की है। सितंबर 2018 में, पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से 10 से 50 वर्ष के आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटाते हुए इसे अवैध और असंवैधानिक करार दिया था।

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बाद में 14 नवंबर 2019 को, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने महिलाओं से भेदभाव के मुद्दे को 3:2 के बहुमत से बड़ी पीठ को भेज दिया था। इस फैसले में केवल शबरिमला ही नहीं, बल्कि मस्जिदों और दरगाहों में मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश तथा गैर-पारसी पुरुषों से विवाह करने वाली पारसी महिलाओं के अगियारी (पवित्र अग्नि स्थल) में प्रवेश के मुद्दों को भी बड़ी पीठ के पास भेजा गया। शीर्ष अदालत ने 16 फरवरी को कहा था कि इस मामले में अंतिम सुनवाई सात अप्रैल से शुरू होगी, जिसके 22 अप्रैल तक पूरी होने की संभावना है।

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