Edited By Rohini Oberoi,Updated: 24 Oct, 2025 12:27 PM

सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिगों की संपत्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है जो उन्हें उनके माता-पिता या अभिभावकों द्वारा किए गए अनधिकृत सौदों से सुरक्षा प्रदान करता है। कोर्ट ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि यदि किसी नाबालिग की...
नेशनल डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिगों की संपत्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है जो उन्हें उनके माता-पिता या अभिभावकों द्वारा किए गए अनधिकृत सौदों से सुरक्षा प्रदान करता है। कोर्ट ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि यदि किसी नाबालिग की संपत्ति उसके अभिभावक द्वारा कोर्ट की अनुमति के बिना बेची जाती है तो बालिग होने के बाद वह उस सौदे को केवल अपने आचरण (Conduct) से भी अस्वीकार (Reject) कर सकता है। इस 'व्यवहार से अस्वीकृति' को कानूनन वैध माना जाएगा और इसके लिए उसे अदालत में औपचारिक मुकदमा दायर करने की आवश्यकता नहीं है।
आचरण से अस्वीकृति क्या है?
जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने के. एस. शिवप्पा बनाम श्रीमती के. नीलाम्मा मामले में यह फैसला सुनाया। जस्टिस मिथल ने कहा कि जब कोई नाबालिग वयस्क हो जाता है तो वह अपने अभिभावक द्वारा किए गए अमान्य करने योग्य (Voidable) संपत्ति हस्तांतरण को स्पष्ट और निर्विवाद प्रवर्तन से अस्वीकार कर सकता है।
अस्वीकृति का यह आचरण ऐसा हो सकता है कि बालिग होने के बाद वह व्यक्ति उसी संपत्ति को स्वयं बेच दे या किसी और को हस्तांतरित कर दे। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कानून में यह निर्दिष्ट नहीं है कि ऐसे अमान्य किए जाने योग्य लेनदेन को किस प्रकार अस्वीकृत किया जाना चाहिए इसलिए आचरण से अस्वीकृति भी मान्य होगी।
हिंदू अधिनियम की धारा 8 का हवाला
कोर्ट ने अपने फैसले को मजबूती देने के लिए हिंदू अप्राप्तवयता संरक्षकता अधिनियम 1956 की धारा 7 और 8 का हवाला दिया। इन प्रावधानों के अनुसार नाबालिग के स्वाभाविक अभिभावक को अदालत की पूर्व अनुमति के बिना नाबालिग की अचल संपत्ति के किसी भी हिस्से को बेचना, बंधक रखना या 5 साल से अधिक अवधि के लिए पट्टे पर देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
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यदि अभिभावक ऐसा करते हैं तो वह लेनदेन नाबालिग के कहने पर अमान्य (Voidable) हो जाएगा। कोर्ट ने कहा कि पूर्व विक्रय विलेख को रद्द कराने के लिए वाद (Suit) दायर करना आवश्यक नहीं है बल्कि वयस्क होने के तीन वर्ष के भीतर आचरण के माध्यम से भी अस्वीकृति मान्य है।
कर्नाटक विवाद से जुड़ा था मामला
यह पूरा विवाद कर्नाटक के दावणगेरे जिले के शामनूर गांव में दो समीपवर्ती भूखंडों (प्लॉट संख्या 56 और 57) से जुड़ा था जिन्हें 1971 में रुद्रप्पा ने अपने तीन नाबालिग बेटों के नाम पर खरीदा था। रुद्रप्पा ने जिला अदालत की अनुमति लिए बिना ये प्लॉट तीसरे पक्ष को बेच दिए। नाबालिगों ने वयस्क होने के बाद अपनी मां के साथ मिलकर वही प्लॉट के.एस. शिवप्पा को बेच दिए।
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निचली अदालतों में उलझन
निचली अदालत ने नाबालिगों की बिक्री को वैध मानते हुए पिता के सौदे को अस्वीकृत माना था। हालांकि बाद में प्रथम अपीलीय न्यायालय और हाईकोर्ट ने इस निर्णय को पलट दिया और कहा कि औपचारिक मुकदमा दायर न करने के कारण पिता का सौदा पक्का हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस उलझन को समाप्त करते हुए हाईकोर्ट के फैसले को खारिज किया और नाबालिगों द्वारा अपने स्वयं के बिक्री विलेख (Sale Deed) के माध्यम से अपने पिता की बिक्री को अस्वीकार करने के अधिकार को बरकरार रखा।