सोना, प्लेटिनम और डायमंड नहीं ये है दुनिया की सबसे महंगी धातु, इसकी खासियत जानकर हो जाएंगे हैरान

Edited By Updated: 26 Jul, 2025 08:33 PM

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दुनिया में कई ऐसी धातुएं हैं जो अपनी दुर्लभता और विशेष गुणों के कारण सोने, प्लेटिनम और हीरे से भी कई गुना अधिक महंगी होती हैं। इनमें से दो प्रमुख धातुएं हैं रोडियम (Rhodium) और रेडियम (Radium)। इनकी कीमत और उपयोगिता ने इन्हें अत्यधिक मूल्यवान बना...

नेशनल डेस्क : दुनिया में कई ऐसी धातुएं हैं जो अपनी दुर्लभता और विशेष गुणों के कारण सोने, प्लेटिनम और हीरे से भी कई गुना अधिक महंगी होती हैं। इनमें से दो प्रमुख धातुएं हैं रोडियम (Rhodium) और रेडियम (Radium)। इनकी कीमत और उपयोगिता ने इन्हें अत्यधिक मूल्यवान बना दिया है।

सोने से भी कीमती है रोडियम
रोडियम एक बेहद दुर्लभ और कीमती धातु है, जिसकी कीमत सोने से डेढ़ गुना अधिक होती है। वर्ष 2024 में इसकी कीमत ₹12,416 प्रति ग्राम तक पहुंच गई थी। यह धातु जंग प्रतिरोधी होती है और इसका उपयोग मुख्य रूप से ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में कैटलिटिक कन्वर्टर्स बनाने के लिए किया जाता है। इसके अलावा आभूषणों में सफेद सोने को चमकाने के लिए भी रोडियम की कोटिंग की जाती है। दुनिया में इसका खनन मुख्यतः दक्षिण अफ्रीका और रूस में होता है। इसकी अत्यधिक दुर्लभता और औद्योगिक उपयोग इसे बेहद कीमती बनाते हैं। इसे 'धातुओं का हीरा' भी कहा जाता है।

क्यों महंगा है रेडियम?
रेडियम, एक रेडियोएक्टिव धातु है जो यूरेनियम अयस्क में अत्यंत कम मात्रा में प्राकृतिक रूप से पाई जाती है। इसे शुद्ध करना और निकालना अत्यंत कठिन, खर्चीला और खतरनाक होता है। यही कारण है कि यह भी बहुत महंगी और दुर्लभ धातु मानी जाती है।

कहां होता है रेडियम का इस्तेमाल?
19वीं सदी में रेडियम का इस्तेमाल चिकित्सा विज्ञान में किया गया था। इसकी गामा किरणें कैंसर जैसे गंभीर रोगों के इलाज में प्रभावी मानी जाती थीं। इसके अलावा रेडियम का उपयोग स्वयं चमकने वाले पेंट, हवाई जहाज के स्विच, घड़ियों के डायल, न्यूक्लियर पैनल, दंतमंजन, और कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स जैसे बालों की क्रीम आदि में भी किया गया। हालांकि, इसके रेडियोएक्टिव गुण स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक साबित हुए, जिसके चलते बाद में इसका उपयोग दवाओं, पेंट और कॉस्मेटिक उत्पादों में पूरी तरह बंद कर दिया गया। आज रेडियम का उत्पादन बहुत कम होता है और इसका उपयोग केवल विज्ञान और शोध के कुछ सीमित क्षेत्रों तक ही सीमित रह गया है।

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