भारत में जन्मा पाकिस्तान का ‘न्यूक्लियर पिता’ कौन था?

Edited By Updated: 01 May, 2025 04:32 PM

pakistan is refusing to accept its own citizens

भारत के भोपाल में जन्मे अब्दुल कादिर खान ने पाकिस्तान को उस मुकाम पर पहुंचा दिया, जिससे आज पूरा विश्व सतर्क रहता है। साल 1935 में जन्मे अब्दुल कादिर बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए।

इंटरनेशनल डेस्क: भारत के भोपाल में जन्मे अब्दुल कादिर खान ने पाकिस्तान को उस मुकाम पर पहुंचा दिया, जिससे आज पूरा विश्व सतर्क रहता है। साल 1935 में जन्मे अब्दुल कादिर बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए। उनका परिवार पढ़ाई-लिखाई और देशभक्ति के लिए जाना जाता था। पिता शिक्षक थे और दादा सेना में अधिकारी। लेकिन जिस बेटे ने देश के लिए सोचते-सोचते एक दिन पूरा बम ही बना डाला, उसकी कहानी जितनी रोमांचक है उतनी ही चौंकाने वाली भी।

यूरोप से चुराया न्यूक्लियर बम का फॉर्मूला

अब्दुल कादिर खान ने पाकिस्तान में विज्ञान की पढ़ाई करने के बाद यूरोप का रुख किया। 1972 में उन्होंने बेल्जियम की यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की डिग्री ली और एम्सटरडैम में FDO नामक रिसर्च संस्था में काम करने लगे। यह संस्था URENCO नाम की यूरोपीय न्यूक्लियर फैसिलिटी के लिए तकनीकी सलाह देती थी। अब्दुल कादिर को 1974 में अलमेलो स्थित URENCO प्लांट के सबसे गुप्त हिस्से में 16 दिन काम करने का मौका मिला। यहीं से उन्होंने ‘अल्ट्रासेंट्रीफ्यूज टेक्नोलॉजी’ के दस्तावेज चुराए। इसी तकनीक से यूरेनियम के संवर्धन द्वारा परमाणु बम तैयार किया जाता है। उन्होंने जर्मन से डच में दस्तावेजों का अनुवाद करते हुए हर वह राज निकाला जिससे बम बन सके।
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जासूस से वैज्ञानिक बनने तक का सफर

अब्दुल कादिर खान यूरोप में 11 साल रहे। इस दौरान उन्होंने दक्षिण अफ्रीकी मूल की एक डच भाषी महिला से शादी कर ली। वे टेक्निकल रिपोर्ट्स को घर पर ले जाकर विदेशी भाषा में ट्रांसलेट करते थे और यही बात उनके सहकर्मियों को अक्सर हैरान करती थी। एक बार जब उनसे पूछा गया कि वह ये सब किसलिए कर रहे हैं तो उन्होंने जवाब दिया कि वे अपने परिवार को पत्र लिखते हैं। कई बार उन्हें फैक्ट्री के आस-पास नोटबुक लिए घूमते हुए देखा गया, लेकिन किसी को शक नहीं हुआ कि वे पाकिस्तान के लिए जासूसी कर रहे हैं। वे इतने शांत और मिलनसार थे कि हर जगह लोग उन्हें पसंद करने लगते थे।

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1976 में लौटे पाकिस्तान और शुरू हुआ न्यूक्लियर मिशन

जनवरी 1976 में अब्दुल कादिर खान अचानक पाकिस्तान लौट आए और एफडीओ से इस्तीफा दे दिया। पाकिस्तान जाकर उन्होंने काहूटा में न्यूक्लियर रिसर्च शुरू की। उन्होंने कनाडा जैसे देशों से सेंट्रीफ्यूज पार्ट्स की तस्करी के लिए एजेंट्स को खत भी लिखे। इसके बाद CIA ने एक रिपोर्ट में चेताया कि पाकिस्तान कुछ ही वर्षों में परमाणु बम बना सकता है। पाकिस्तानी राष्ट्रपति जिया उल हक दुनिया को भरोसा दिलाते रहे कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं है। लेकिन अब्दुल कादिर खान धीरे-धीरे अपने मिशन में लगे रहे।

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1983 में किया पहला न्यूक्लियर टेस्ट

1980 तक पाकिस्तान यूरेनियम संवर्धन में हथियार स्तर तक पहुंच चुका था। 1983 में पहली बार पाकिस्तान ने गुपचुप परमाणु परीक्षण किया। हालांकि आधिकारिक रूप से पाकिस्तान ने 1998 में पोखरण-2 के बाद जवाबी टेस्ट किए। पश्चिमी मीडिया ने अब्दुल कादिर खान को ‘सुपर स्पाई’ का नाम दिया, लेकिन वे खुद को हमेशा एक सच्चा देशभक्त बताते रहे। साल 1990 में अब्दुल कादिर खान ने दावा किया कि काहूटा में हुआ रिसर्च उनकी टीम की मेहनत और नवाचार का नतीजा था, किसी विदेशी तकनीक की मदद नहीं ली गई। पाकिस्तान ने उनकी सेवाओं के सम्मान में 'A.Q. Khan Research Laboratory' की स्थापना की। आज भी पाकिस्तान की न्यूक्लियर ताकत का ज़िक्र होता है तो सबसे पहले अब्दुल कादिर खान का नाम सामने आता है।

भारत-पाक तनाव और न्यूक्लियर धमकियों के बीच फिर याद आए कादिर खान

हाल में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत की कड़ी प्रतिक्रिया के चलते पाकिस्तान के मंत्री बार-बार न्यूक्लियर वॉर की धमकी दे रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि तकनीकी और सैन्य दृष्टि से भारत आज पाकिस्तान से कहीं आगे है। यदि पाकिस्तान किसी भी तरह की नासमझी करता है तो उसे अंजाम की कल्पना भी नहीं होगी। और उस स्थिति में इतिहास एक बार फिर अब्दुल कादिर खान का नाम सामने लाएगा — एक ऐसा नाम जिसने पाकिस्तान को परमाणु शक्ति तो दी लेकिन एक स्थायी डर भी दे गया।

 

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