Edited By Parveen Kumar,Updated: 05 Jan, 2026 09:32 PM

उच्चतम न्यायालय ने कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) योजना से जुड़े एक अहम मुद्दे पर केंद्र सरकार को बड़ा निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि वह EPF योजना में वेतन सीमा के संशोधन पर चार महीने के भीतर कोई ठोस फैसला ले। गौर करने वाली बात यह...
नेशनल डेस्क: उच्चतम न्यायालय ने कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) योजना से जुड़े एक अहम मुद्दे पर केंद्र सरकार को बड़ा निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि वह EPF योजना में वेतन सीमा के संशोधन पर चार महीने के भीतर कोई ठोस फैसला ले। गौर करने वाली बात यह है कि इस वेतन सीमा में पिछले 11 वर्षों से कोई बदलाव नहीं किया गया है।
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने यह आदेश सामाजिक कार्यकर्ता नवीन प्रकाश नौटियाल द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में कहा गया है कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) फिलहाल 15,000 रुपये से अधिक मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों को इस योजना से बाहर रखता है, जिससे बड़ी संख्या में कामकाजी लोग सामाजिक सुरक्षा के दायरे से वंचित रह जाते हैं।
70 साल में मनमाने ढंग से बदली गई सैलरी सीमा
याचिकाकर्ता की ओर से वकील प्रणव सचदेवा और नेहा राठी ने दलील दी कि देश के कई राज्यों में न्यूनतम वेतन ही EPF की मौजूदा सीमा से अधिक हो चुका है, इसके बावजूद वेतन सीमा में संशोधन नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि पिछले 70 वर्षों में EPF की वेतन सीमा का पुनरीक्षण बेहद मनमाने तरीके से हुआ है। कई बार 13–14 साल के लंबे अंतराल के बाद बदलाव किया गया, जबकि इस दौरान महंगाई, न्यूनतम वेतन और प्रति व्यक्ति आय जैसे अहम आर्थिक संकेतकों को नजरअंदाज किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता दो सप्ताह के भीतर आदेश की प्रति के साथ केंद्र सरकार के समक्ष अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करे। इसके बाद सरकार को चार महीने के भीतर इस पर निर्णय लेना होगा।
कम कर्मचारियों को मिल रहा EPF का लाभ
याचिका में यह भी कहा गया है कि इस असंतुलित नीति के चलते आज पहले की तुलना में कहीं कम कर्मचारियों को EPF योजना का लाभ मिल पा रहा है। साल 2022 में EPFO की एक उप-समिति ने वेतन सीमा बढ़ाने और ज्यादा कर्मचारियों को योजना में शामिल करने की सिफारिश की थी, जिसे केंद्रीय बोर्ड से भी मंजूरी मिली थी। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने अब तक इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है।
याचिका के अनुसार, शुरुआती 30 वर्षों में EPF योजना का ढांचा अपेक्षाकृत समावेशी था, लेकिन पिछले तीन दशकों में यह व्यवस्था धीरे-धीरे अधिक कर्मचारियों को बाहर रखने का माध्यम बनती चली गई है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश के बाद अब सभी की निगाहें केंद्र सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।