Middle Class Struggle: जिनकी सैलरी 35 से 65 हजार रुपये इनके घर 'Planning' से नहीं, बल्कि 'Adjustment' से चल रहे, रिपोर्ट ने खोला कड़वा सच

Edited By Updated: 14 Jan, 2026 11:33 AM

those whose salary 35 to 65 thousand rupees their houses running adjustment

आज के दौर में मोबाइल पर एक क्लिक करते ही बैंक खाते में पैसा तो आ जाता है, लेकिन यह सुविधा लाखों भारतीय परिवारों के लिए एक ऐसा अंतहीन दलदल बन गई है जिससे निकलना नामुमकिन सा लग रहा है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, देश का एक बड़ा हिस्सा अब अपनी जरूरतों के...

नेशनल डेस्क: आज के दौर में मोबाइल पर एक क्लिक करते ही बैंक खाते में पैसा तो आ जाता है, लेकिन यह सुविधा लाखों भारतीय परिवारों के लिए एक ऐसा अंतहीन दलदल बन गई है जिससे निकलना नामुमकिन सा लग रहा है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, देश का एक बड़ा हिस्सा अब अपनी जरूरतों के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ पुराने कर्ज का ब्याज भरने के लिए जी रहा है।

कमाई का आधा हिस्सा 'बैंकों' के नाम
एक चौंकाने वाले सर्वे (जून-दिसंबर 2025) से पता चला है कि लगभग 85% लोग अपनी मासिक आय का 40% से अधिक हिस्सा केवल किस्तों (EMIs) में गंवा रहे हैं। सबसे बुरा हाल उन नौकरीपेशा लोगों का है जिनकी सैलरी 35 से 65 हजार रुपये के बीच है। इनके घर का बजट अब 'Planning' से नहीं, बल्कि 'Adjustment' से चल रहा है। आलम यह है कि घर का किराया, बच्चों की School Fees और राशन की लिस्ट तैयार होने से पहले ही बैंक खाते का बैलेंस शून्य की ओर बढ़ जाता है।

कर्ज से कर्ज का खेल: एक खतरनाक चक्र
जब हाथ खाली होते हैं, तो लोग अपनी इज्जत बचाने के लिए 'उधार के चक्रव्यूह' में फंस जाते हैं। सर्वे की मानें तो: 40% लोग एक क्रेडिट कार्ड का बिल भरने के लिए दूसरे कार्ड का इस्तेमाल कर रहे हैं। 22% लोग दोस्तों और रिश्तेदारों के आगे हाथ फैलाने को मजबूर हैं। जब कहीं से रास्ता नहीं मिलता, तो लोग अपनी जमा-पूंजी, गहने और यहाँ तक कि भविष्य के लिए रखे Share और Mutual Fund भी बेच रहे हैं।

समझौता: पेट और पढ़ाई पर कैंची
यह संकट केवल पैसों तक सीमित नहीं है, यह अब घरों के चूल्हे और बच्चों के भविष्य पर वार कर रहा है। कर्ज के बोझ तले दबे 65% परिवारों ने बुनियादी सुविधाओं में कटौती की है। इनमें बच्चों को ट्यूशन से हटाना, जरूरी इलाज को टाल देना और खाने-पीने के खर्च को कम करना शामिल है। करीब 16% लोग तो महीना शुरू होने से पहले ही अपनी सैलरी का एडवांस मांग रहे हैं।

रिकवरी का 'आतंक' और मानसिक दबाव
कर्ज न चुका पाने की स्थिति में रिकवरी एजेंटों का व्यवहार किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं है। 67% कर्जदारों को अपमानजनक कॉल्स और धमकियों का सामना करना पड़ा। बेवक्त आने वाले कॉल्स (सुबह 6 बजे या देर रात 10 बजे) ने लोगों का चैन छीन लिया है। इसका परिणाम यह है कि आधे से ज्यादा लोग डिप्रेशन, एंग्जायटी और नींद न आने जैसी गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। 'Buy Now Pay Later' जैसी स्कीमों ने लोगों को इस कदर जकड़ लिया है कि कुछ लोग अब आत्मघाती कदम उठाने जैसे विचार तक पहुंच रहे हैं।


 

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