Medicine Crisis: LPG संकट के बाद दवा इंडस्ट्री पर खतरा, सिर्फ 10 दिन का स्टॉक बाकी, शुगर, बुखार से लेकर इन दवाओं की हो सकती किल्लत

Edited By Updated: 19 Mar, 2026 09:31 AM

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पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब भारत की सेहत व्यवस्था पर भी दिखने लगा है। ऊर्जा आपूर्ति में आई रुकावट ने दवा उद्योग की चिंता बढ़ा दी है, जिससे जरूरी दवाओं की उपलब्धता पर संकट गहराने लगा है। हालात ऐसे बनते नजर आ रहे हैं कि बुखार, संक्रमण और...

Medicine Crisis:  पश्चिम एशिया में छिड़े भीषण संघर्ष ने अब न केवल वैश्विक राजनीति बल्कि आम आदमी की सेहत और रसोई पर भी सीधा प्रहार करना शुरू कर दिया है। युद्ध के कारण पैदा हुए ऊर्जा संकट ने भारत के फार्मास्युटिकल यानी दवा उद्योग के सामने अस्तित्व की चुनौती खड़ी कर दी है। ईरान द्वारा सामरिक रूप से महत्वपूर्ण 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) को बंद किए जाने से वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा गई है। इसका सबसे बुरा असर भारत में गैस के आयात पर पड़ा है, जिससे बुखार से लेकर डायबिटीज तक की जरूरी दवाओं का उत्पादन ठप होने की कगार पर है।

प्रोपेन गैस की कमी से थमने वाले हैं बॉयलर
भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए प्रोपेन गैस एक अनिवार्य ईंधन की तरह काम करती है, जिसका उपयोग दवाओं को बनाने वाले बॉयलरों में होता है। वर्तमान में एलएनजी (LNG) आयात में आई भारी बाधा के कारण गुजरात, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे प्रमुख दवा उत्पादन केंद्रों की स्थिति नाजुक हो गई है। कई बड़ी कंपनियों के पास अब केवल 10 दिनों का स्टॉक शेष बचा है। यदि युद्ध के कारण गैस आपूर्ति का यह अवरोध जल्द समाप्त नहीं हुआ, तो करीब 200 से अधिक दवा निर्माताओं को अगले एक हफ्ते के भीतर अपने कारखानों में ताले लगाने पड़ सकते हैं।

दवाइयों की कीमतों में भारी उछाल और किल्लत का डर
Drug Traders Association ने चेतावनी जारी की है कि कच्चे माल की कमी, बढ़ती शिपिंग लागत और पैकेजिंग सामग्री की अनुपलब्धता के कारण दवाओं की कीमतों में 10 से 20 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है। इस संकट की सीधी मार उन मरीजों पर पड़ेगी जिन्हें रोजाना Paracetamol, Metformin (Diabetes), Metronidazole, Diclofenac, Folic Acid and Vitamin C जैसी दवाओं की जरूरत होती है। भारत दुनिया में जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा केंद्र है और वैश्विक आपूर्ति में हमारी 20 प्रतिशत की हिस्सेदारी है, लेकिन कच्चे माल और ऊर्जा के लिए विदेशी निर्भरता ने आज इस सेक्टर को घुटनों पर ला दिया है।

फार्मा के बाद अब dairy sector पर भी मंडराया खतरा
हैरानी की बात यह है कि गैस संकट का असर अब दवाइयों से निकलकर दूध और डेयरी उत्पादों तक पहुंच गया है। महाराष्ट्र समेत कई राज्यों के डेयरी मालिकों का कहना है कि गैस की कमी की वजह से दूध की पैकेजिंग के लिए जरूरी प्लास्टिक और अन्य सामग्री का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। अगर यही स्थिति बनी रही, तो दवाइयों के साथ-साथ दूध की सप्लाई भी बाधित हो सकती है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें लाल सागर और हॉर्मुज क्षेत्र पर टिकी हैं, क्योंकि वहां से आने वाली एक धमकी भी भारत के मध्यम वर्ग की जेब और सेहत दोनों का बजट बिगाड़ सकती है। 

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