Edited By jyoti choudhary,Updated: 18 Mar, 2026 12:50 PM

वैश्विक स्तर पर बढ़ते युद्ध और तनाव के बीच आमतौर पर निवेशक सुरक्षित विकल्प के रूप में सोने की ओर रुख करते हैं लेकिन इस बार हालात कुछ अलग नजर आ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बॉन्ड यील्ड और कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी जारी रहती है, तो...
बिजनेस डेस्कः वैश्विक स्तर पर बढ़ते युद्ध और तनाव के बीच आमतौर पर निवेशक सुरक्षित विकल्प के रूप में सोने की ओर रुख करते हैं लेकिन इस बार हालात कुछ अलग नजर आ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बॉन्ड यील्ड और कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी जारी रहती है, तो सोने की कीमतों पर दबाव बन सकता है।
फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना करीब 5,000 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार कर रहा है, जबकि भारत में इसकी कीमत लगभग 1,61,390 रुपए प्रति 10 ग्राम है। एक्सपर्ट के मुताबिक सोना 4,200 डॉलर तक गिर सकता है, ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि घरेलू बाजार में इसका असर कितना होगा।
भारत में कितना गिर सकता है सोना?
यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में करीब 16 प्रतिशत की गिरावट आती है और अन्य कारक स्थिर रहते हैं, तो भारत में सोने की कीमत भी इसी अनुपात में गिर सकती है। इस हिसाब से 1,61,390 रुपए प्रति 10 ग्राम से घटकर यह लगभग 1,35,000 से 1,37,000 रुपए के दायरे में आ सकता है। हालांकि, अंतिम कीमत पर डॉलर-रुपया विनिमय दर, टैक्स और मांग का भी असर होगा।
सोने पर दबाव के प्रमुख कारण
बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी: अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ने पर निवेशकों को बेहतर रिटर्न मिलता है, जिससे वे सोने से पैसा निकालकर बॉन्ड में निवेश करने लगते हैं।
तेल की बढ़ती कीमतें: मिडिल ईस्ट में तनाव के चलते तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है, जिससे ब्याज दरें ऊंची बनी रह सकती हैं।
मजबूत डॉलर: डॉलर मजबूत होने पर अन्य देशों के निवेशकों के लिए सोना महंगा हो जाता है, जिससे मांग घटती है।
जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता: युद्ध की दिशा और अवधि भी सोने की चाल को प्रभावित करती है। कई बार निवेशक नकदी जुटाने के लिए सोना भी बेचते हैं।
शेयर बाजार का दबाव: बाजार में गिरावट के दौरान बड़े निवेशक नुकसान की भरपाई के लिए सोना बेच सकते हैं, जिससे कीमतों पर असर पड़ता है।
निवेशकों के लिए क्या संकेत?
विशेषज्ञों का मानना है कि सोना हमेशा एक दिशा में नहीं चलता। यह कभी डर के माहौल में तेजी दिखाता है तो कभी ब्याज दरों और आर्थिक संकेतों के चलते गिरावट में आ जाता है।
हालांकि, लंबी अवधि के निवेशकों के लिए गिरावट अक्सर खरीद का अवसर बन सकती है। ऐसे में बाजार की चाल को समझकर ही निवेश का निर्णय लेना बेहतर माना जाता है।