आज है आचार्य सम्राट परम पूज्य श्री शिव मुनि जी महाराज का 79 वां जन्म महोत्सव

Edited By Updated: 18 Sep, 2020 05:40 AM

achrya samrat pujya shri shiv muni ji

जीवन, जगत तथा अध्यात्म का गहन अनुभव रखने वाले युग प्रधान, अध्यात्म योगी, क्रांत द्रष्टा आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिव मुनि जी महाराज का जन्म पंजाब की पावन धरा पर 18 सितम्बर,

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Achrya Samrat Pujya Shri Shiv Muni ji: जीवन, जगत तथा अध्यात्म का गहन अनुभव रखने वाले युग प्रधान, अध्यात्म योगी, क्रांत द्रष्टा आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिव मुनि जी महाराज का जन्म पंजाब की पावन धरा पर 18 सितम्बर, 1942 ई. को रानियां में पूज्य माता श्रीमती विद्या देवी और पूज्य पिता श्री चिरंजी लाल जैन के घर हुआ।

पूर्व जन्मों के उच्च संस्कारों तथा पुण्योदय से आपके सरल हृदय पर वैराग्य के संस्कारों ने स्थान बना लिया और अंतत: परिवार की आज्ञा से आपने आचार्य सम्राट पूज्य श्री आत्मा राम जी महाराज के परम शिष्य राष्ट्र संत, श्रमण संघीय सलाहकार पूज्य गुरुदेव श्री ज्ञान मुनि जी महाराज के श्री चरणों में 17 मई, 1972 ई. को मलोट नगरी में मुनि दीक्षा अंगीकार की। दीक्षा के समय आपने कहा था, ‘‘मैं अपने कुल का गौरव रखूंगा और सिंह की भांति दृढ़ता के साथ संयम का पालन करूंगा।’’

मुनि दीक्षा के पश्चात आप उस मार्ग पर अग्रसर हुए जो आपको अभीष्ट था। वह मार्ग था साधना का, संघ सेवा का, मानवता के कल्याण का और आत्म साक्षात्कार का। आपने अपने संयमी जीवन में अप्रमत्त भाव से स्वाध्याय और ध्यान साधना का संबल लेकर भारत की आर्ष परम्परा को अक्षुण्ण बनाए रखा है। आपको अपने दादा गुरु आचार्य सम्राट पूज्य श्री आत्मा राम जी महाराज की ध्यान साधना की परम्परा को जन-जन तक पहुंचाकर उसे एक आध्यात्मिक आंदोलन का रूप प्रदान करने का श्रेय प्राप्त है।

 आपकी साधना, संघ सेवा और एकता के कार्य के प्रति समर्पण भाव को दृष्टिगत रख कर आपको 13 मई, 1987 ई. को पूना में युवाचार्य पद तथा 9 जून, 1999 में अहमदनगर में श्रमण संघ के आचार्य सम्राट के पद से विभूषित किया गया। इतने उच्च पदों को प्राप्त कर आपने कहा मैं श्रमण संघ के अविचल और मंगल के लिए समर्पण भाव से कार्य करूंगा। आप अब तक इस कार्य में सलंग्न हैं और श्रमण संघ आपके कुशल नेतृत्व में उत्तरोत्तर उन्नति के शिखरों पर है।

आपने आचार्य सम्राट पूज्य श्री आत्मा राम जी महाराज के समस्त साहित्य का पुनप्ररकाशन करवाकर जैन साहित्य की मंजूषा को भर दिया। आपकी उत्कट भावना है कि लोग अध्यात्म साधना के साथ-साथ स्वाध्याय प्रेमी भी बनें।

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