Edited By Sarita Thapa,Updated: 15 Jan, 2026 04:22 PM

नदी के किनारे एक संत आश्रम बनाकर रहते और शिष्यों को शिक्षा देते थे। उनका एक शिष्य दिन-रात उनके पास ही रहता था। संत भी उसके प्रति काफी स्नेह रखते थे। एक दिन उसने संत से सवाल किया, ‘‘गुरु जी, मनुष्य महान किस तरह बन सकता है?’’
Best Motivational Story : नदी के किनारे एक संत आश्रम बनाकर रहते और शिष्यों को शिक्षा देते थे। उनका एक शिष्य दिन-रात उनके पास ही रहता था। संत भी उसके प्रति काफी स्नेह रखते थे। एक दिन उसने संत से सवाल किया, ‘‘गुरु जी, मनुष्य महान किस तरह बन सकता है?’’
संत बोले, ‘‘कोई भी मनुष्य महान बन सकता है लेकिन इसके लिए कुछ नियमों का पालन करना होगा।’’ इस पर शिष्य बोला, ‘‘कौन से नियमों का?’’
संत ने शिष्य की बात सुनकर एक पुतला मंगवाया। संत के आदेश पर पुतला लाया गया। संत ने शिष्य से कहा कि वह उस पुतले की खूब प्रशंसा करे। शिष्य ने पुतले की तारीफों के पुल बांधने शुरू कर दिए। वह बड़ी देर तक ऐसा करता रहा। इसके बाद संत बोले, ‘‘अब तुम पुतले का अपमान करो।’’ संत के कहने पर शिष्य ने पुतले का अपमान करना शुरू कर दिया। पुतला क्या करता। वह अब भी शांत रहा।

संत बोले, ‘‘तुमने इस पुतले की प्रशंसा व अपमान करने पर क्या देखा?’’ शिष्य बोला, ‘‘गुरु जी, मैंने देखा कि पुतले पर प्रशंसा व अपमान का कुछ भी फर्क नहीं पड़ा।’’
शिष्य की बात सुनकर संत बोले, ‘‘बस महान बनने का यही एक सरल उपाय है। जो व्यक्ति मान-अपमान को समान रूप से सह लेता है, वही महान कहलाता है। महान बनने का इससे बेहतर उपाय कोई और नहीं हो सकता।’’ संत की इस व्याख्या से शिष्य सहमत हो गया।

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