Prayagraj Magh Mela 2026 : पुण्य भी और व्यापार भी ! जानिए कौन हैं वो लोग जो 106 साल से बसा रहे हैं माघ मेले की टेंट सिटी

Edited By Updated: 28 Jan, 2026 10:14 AM

prayagraj magh mela 2026

संगम की रेती पर जब लाखों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं, तो उन्हें सिर छिपाने के लिए छत और रहने के लिए एक व्यवस्थित शहर मिलता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कड़ाके की ठंड और रेतीली हवाओं के बीच इस तंबुओं के शहर को कौन वजूद में लाता है।

Prayagraj Magh Mela 2026 : संगम की रेती पर जब लाखों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं, तो उन्हें सिर छिपाने के लिए छत और रहने के लिए एक व्यवस्थित शहर मिलता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कड़ाके की ठंड और रेतीली हवाओं के बीच इस तंबुओं के शहर को कौन वजूद में लाता है। यह काम कोई आधुनिक बिल्डर नहीं, बल्कि वह टेंट वाले खानदान कर रहे हैं जो पिछली चार पीढ़ियों लगभग 106 साल से इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।

जहां आज के दौर में प्री-फैब्रिकेटेड स्ट्रक्चर का बोलबाला है, वहीं माघ मेले में आज भी पारंपरिक बांस, बल्ली, सुतली और मोटे कपड़ों का जादू चलता है। साल 1920 से ही बाल गोविंद दास ने प्रयागराज माघ मेले में तंबु लगाने काम शुरू कर दिया था।  बताया गया कि बाल गोविंद दास, 1918 में वाराणसी से प्रयागराज आकर बस गए थे। 100 साल से भी ज्यादा समय से उनके परिवार और उनके कारीगर इस हुनर को संजोए हुए हैं। उनके पास कोई इंजीनियरिंग की डिग्री नहीं है, लेकिन रेतीली जमीन पर तंबू को इस तरह गाड़ने का अनुभव है कि बड़े से बड़ा तूफान भी इन्हें हिला नहीं पाता।

पीढ़ियों से चला आ रहा है यह आस्था का व्यापार
मेले में टेंट लगाने वाले ठेकेदारों का कहना है कि उनके परदादाओं ने ब्रिटिश काल के दौरान यह काम शुरू किया था। तब सुविधाएं कम थीं, लेकिन उत्साह आज जैसा ही था। आज भी उनके वंशज उसी शिद्दत से इस अस्थाई राजधानी को बसाने में जुट जाते हैं। गंगा की गीली रेती पर बिजली की फिटिंग से लेकर टिन की दीवारें खड़ी करना किसी चुनौती से कम नहीं होता। मेला शुरू होने से दो महीने पहले ही हजारों मजदूर दिन-रात मेहनत करके हजारों टेंट तैयार करते हैं।अब पारंपरिक तंबुओं के साथ-साथ स्विस कॉटेज और लग्जरी टेंट भी देखने को मिलते हैं, लेकिन आधार आज भी वही पुरानी मेहनत है।

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