इस मंदिर में प्रसाद के रूप में मिलती है हरियाली, न केवल देश विदेशों में भी फैली इसकी ख्याति

Edited By Jyoti,Updated: 19 Nov, 2022 04:39 PM

raj rajeshwari temple uttaranchal

हमारे देश में ऐसे कई मंदिर व धार्मिक स्थान हैं जो अपनी विशेषताओं के लिए देश में नहीं बल्कि विदेशों में भी बहुत प्रसिद्ध है। आज हम आपको देवभूमी उत्तरांचल के श्रीनगर गढ़वाल से 18 कि.मी की दूरी पर स्थित देवी मां के ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं

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हमारे देश में ऐसे कई मंदिर व धार्मिक स्थान हैं जो अपनी विशेषताओं के लिए देश में नहीं बल्कि विदेशों में भी बहुत प्रसिद्ध है। आज हम आपको देवभूमी उत्तरांचल के श्रीनगर गढ़वाल से 18 कि.मी की दूरी पर स्थित देवी मां के ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं जहां प्रसाद के रूप में भक्तों में हरियाली प्रसाद के रूप में भांटा जाता है। आपको बता दें जिस मंदिर की हम बात कर रहे हैं वो देश में श्री राज राजेश्वरी सिद्धपीठ के नाम से प्रसिद्ध है। ऐसा बताया जाता है कि देवी के इस प्राचीन मंदिर में न केवल लोग नवरात्रों के दौरान ही नहीं बल्कि पूरा वर्षभर लोग पहुंचते हैं। आइए विस्तारपूर्वक जानते हैं इस मंदिर के बारे में- 
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बता दें माता राजेश्वरी माता को धन, वैभव, योग तथा मोक्ष की देवी कहा जाता है, जिनका  सिद्धपीठ घने जंगलों के बीचो-बीच स्थित है। लोक मान्यता है कि प्राचीन समय से पूज्य देवी राज राजेश्वरी की उस समय के कई राजाओं-महाराजाओं की कुल देवी हैं। कहा जाता है कि जिस तरह प्राचीन समय में इनके अनेकों अनन्य भक्त थे ठीक उसी तरह वर्तमान समय में भी इनके भक्तों की गिनती में कोई कमी नहीं है। भक्तों की अटूट आस्था का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि न केवल देश में बल्कि विदेशों तक में भी इस मंदिर में होने वाले यज्ञ आदि की भभूत पोस्ट ऑफिस के द्वारा भेजी जाती है। आपकी जानकारी के लिए बता दें राज राजेश्वरी देवी को स्वयं माता भगवती का रूप माना गया है। 
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मंदिर की खासियत- 
अन्य मंदिरों से यह मंदिर भिन्न इसलिए माना जाता है क्योंकि देवी राज राजेश्वरी मंदिर में निवास नहीं करती। बल्कि यहां मां मंदिर के बजाय पठाल से बने घर में निवास करती हैं। मंदिर की मूर्ति और यंत्र भवन में रखे गए हैं। रोजाना यहां परंपरा के अनुसार विशेष पूजा, पाठ, हवन किया जाता है।  इससे जुड़ी एक खास बात ये भी है कि प्रत्येक वर्ष  प्रथम नवात्र के दौरान यहां किन्हीं यंत्रों की पूजा-अर्चना की जाती है। जिसके बाद नौ दिन तक इनका पूजन कर, आखिर नवरात्रि के दिन भक्तों में हरियाली बांटी जाती है। बता दें मंदिर से जुड़ी मान्यता के अनुसार सन् 1512 में यहां श्री महिषमर्दिनी यंत्र और कामेश्वरी यंत्र को स्थापित किया गया था। सिद्धपीठ के पुजारियों का कहना है कि 1981 से पीठ में अखंड ज्योति की परंपरा शुरु हुई। तथा बीते कई सालों से हर दिन हवन की परपंरा आज भी जारी है। कहा ये भी जाता है कि उत्तराखंड में जागृत श्रीयंत्र भी यहीं स्थापित है।
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विदेशों में भी मंदिर को लेकर अटूट आस्था- 
सिद्धपीठ में होने वाले हवन-यज्ञ आदि की भभूत पोस्ट ऑफिस के जरिए विदेशों में भेजी जाती है। जिसमें सऊदी अरब, ऑस्ट्रेलिया, लंदन, अमेरिका का नाम शामिल है। जिससे ये साफ होता है कि मंदिर ेस देश के साथ-साथ विदेशों में रह रहे लोगों की आस्था भी जुड़ी है।
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