'धर्म का उद्देश्य समाज को बांटना नहीं, मानवता को जोड़ना है', स्वामी सर्वलोकानंद का स्पष्ट संदेश

Edited By Updated: 14 Feb, 2026 12:45 PM

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स्वामी सर्वलोकानंदजी महाराज ने संन्यास, सेवा और वेदांत के माध्यम से रामकृष्ण मिशन के मानवता, एकता और राष्ट्रसेवा के संदेश को विश्वभर में आगे बढ़ाया।

नई दिल्ली/ टीम डिजिटल। रामकृष्ण मठ एवं रामकृष्ण मिशन के वरिष्ठ संन्यासी स्वामी सर्वलोकानंदजी का जीवन आध्यात्म, सेवा और मानव एकता के संदेश को समर्पित रहा है। उन्होंने वर्ष 1973 में हरिद्वार के कंकाल स्थित रामकृष्ण मठ शाखा से संन्यास जीवन की शुरुआत करते हुए पवित्र संन्यासी संघ में प्रवेश किया था। वर्तमान समय में वे रामकृष्ण मिशन, नई दिल्ली के प्रमुख एवं सचिव के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।


स्वामी सर्वलोकानंदजी का योगदान केवल आध्यात्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा है। वे रामकृष्ण मिशन सेवाप्रतिष्ठान के अध्यक्ष भी रह चुके हैं, जो मिशन का सबसे बड़ा अस्पताल है। इसके अलावा उन्होंने मुंबई स्थित रामकृष्ण मठ एवं मिशन में अध्यक्ष और सचिव के रूप में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। कोलकाता के नरेंद्रपुर स्थित रामकृष्ण आश्रम, जो मिशन का सबसे बड़ा शैक्षणिक संस्थान है, वहां भी उन्होंने प्रमुख के रूप में सेवाएं दीं और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया।


वेदांत दर्शन के प्रख्यात वक्ता के रूप में स्वामी सर्वलोकानंदजी श्री रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के सार्वभौमिक संदेश का व्यापक प्रचार-प्रसार करते रहे हैं। शांति, सद्भाव और मानव एकता के उद्देश्य से उन्होंने भारत के साथ-साथ अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, रूस, तुर्की और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे कई देशों की यात्राएं की हैं। अंतर-धार्मिक एवं अंतः-धार्मिक संवादों और धर्म संसद जैसे वैश्विक मंचों पर उनकी उपस्थिति ने मानवता को जोड़ने का संदेश दिया है।

 

रामकृष्ण मिशन की दिल्ली (पहाड़गंज) शाखा की स्थापना वर्ष 1927 में हुई थी। वर्ष 2027-28 में इस शाखा का शताब्दी समारोह मनाया जाएगा। यह उत्सव केवल औपचारिक आयोजन नहीं होगा, बल्कि पूरे वर्ष चलने वाला आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महोत्सव होगा।

इस दौरान आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रमों में शामिल होंगे-

* सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ
* संगोष्ठियाँ और सेमिनार
* अंतरधार्मिक संवाद
* युवा सशक्तिकरण कार्यक्रम
* भाईचारा और सहिष्णुता पर विचार-विमर्श

 

स्वामी सर्वलोकानंदजी के अनुसार, रामकृष्ण मिशन की स्थापना 1 मई 1897 को स्वामी विवेकानंद द्वारा की गई थी। यह संस्था पिछले 125 वर्षों से अधिक समय से मानव सेवा और आध्यात्मिक जागरण के कार्य में जुटी हुई है। मिशन का उद्देश्य केवल धार्मिक उपदेश देना नहीं, बल्कि जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक दोनों पक्षों का संतुलित विकास सुनिश्चित करना है।


रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं से प्रेरित यह संस्था इस विचार पर कार्य करती है कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर दिव्यता निहित है। आवश्यकता केवल उसे पहचानने और जागृत करने की है। भारतीय दर्शन के 'अभ्युदय' यानी भौतिक उन्नति और 'निःश्रेयस' यानी आध्यात्मिक कल्याण के समन्वय को रामकृष्ण मिशन अपने कार्यों का आधार मानता है।


शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, ग्रामीण विकास, आपदा राहत और नैतिक मूल्यों के प्रसार जैसे क्षेत्रों में रामकृष्ण मिशन की सक्रिय भूमिका रही है। देश-विदेश में फैली इसकी अनेक शाखाएं समाज सेवा का कार्य कर रही हैं। दिल्ली के पहाड़गंज स्थित शाखा, जिसकी स्थापना 27 अप्रैल 1927 को हुई थी, राजधानी की एक प्रतिष्ठित आध्यात्मिक संस्था मानी जाती है और सामाजिक सद्भाव, सहिष्णुता एवं नैतिक चेतना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।


स्वामी सर्वलोकानंदजी का कहना है कि वर्तमान समय की सामाजिक चुनौतियों के बीच रामकृष्ण मिशन का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। “सर्वधर्म समभाव” और “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को आगे बढ़ाते हुए मिशन यह मानता है कि धर्म का उद्देश्य समाज को बांटना नहीं, बल्कि मानवता को एक सूत्र में पिरोना है। युवाओं के लिए संचालित विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से रामकृष्ण मिशन उन्हें सकारात्मक दिशा देने, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाने का प्रयास करता है। मिशन का विश्वास है कि वास्तविक परिवर्तन बाहरी व्यवस्थाओं से नहीं, बल्कि व्यक्ति के आंतरिक परिवर्तन से संभव है।


मानव सेवा को ही ईश्वर सेवा मानने की भावना के साथ रामकृष्ण मिशन आज भी स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित आदर्शों पर चलते हुए आत्मोन्नति के साथ समाज और राष्ट्र की उन्नति के लिए निरंतर कार्य कर रहा है।

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