Srimad Bhagavad Gita: श्री कृष्ण कहते हैं, ये काम करने से सारे कर्म विलीन हो जाते हैं

Edited By Updated: 01 Sep, 2023 08:19 AM

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‘अनासक्ति’ और ‘वीतराग’ जैसे कुछ शब्द गीता का मूल उपदेश हैं जबकि आसक्ति और विरक्ति दो ध्रुव हैं, अनासक्ति का मतलब इन ध्रुवों को पार करना है। इसी तरह, वीतराग न

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Srimad Bhagavad Gita: ‘अनासक्ति’ और ‘वीतराग’ जैसे कुछ शब्द गीता का मूल उपदेश हैं जबकि आसक्ति और विरक्ति दो ध्रुव हैं, अनासक्ति का मतलब इन ध्रुवों को पार करना है। इसी तरह, वीतराग न तो राग है और न ही विराग लेकिन दोनों से परे है।

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ये ध्रुवताएं और कुछ नहीं, बल्कि अहंकार की झलक हैं और एक अहंकार को छोड़ देने पर व्यक्ति सभी द्वंद्वों को पार कर जाता है। यह अवस्था और कुछ नहीं बल्कि मुक्ति है। इस संदर्भ में, श्री कृष्ण कहते हैं (4.23), ‘‘जो मुक्त है, आसक्ति से रहित है, ज्ञान में स्थापित मन और यज्ञ के लिए कार्य करता है, उसके सारे कर्म विलीन हो जाते हैं।’’

‘मैं’ हमारी संपत्ति; दोस्त और दुश्मन; पसंद और नापसंद और विचार तथा भावनाओं के साथ पहचान है। उन्हें छोडऩे से अस्थायी शून्यता आती है, जिससे दर्द, भय, क्रोध और आक्रोश पैदा होता है, इसलिए ‘मैं’ को छोड़ना कोई आसान काम नहीं। दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ स्वामित्व, पहचान और कर्तापन की भावना को छोड़ने की है, न कि रिश्तों, चीजों या लोगों को। मुक्ति तभी आती है, जब हम इस सूक्ष्म अंतर को जान लेते हैं।

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जिस व्यक्ति ने ‘मैं’ का त्याग कर दिया है, उसके सभी नि:स्वार्थ कर्म यज्ञ के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। यज्ञ का शाब्दिक अर्थ एक अग्नि अनुष्ठान है, जहां अग्नि को आहुति दी जाती है। यहां इसे बलिदान या देने और लेने के लिए एक रूपक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। हम आग को आहुति देते हैं, जो बदले में हमें गर्मी देती है, जो खाना पकाने, पानी को तरल रूप में रखने और शरीर के तापमान को बनाए रखने जैसे उद्देश्यों के लिए जीवन में आवश्यक है। मानव शरीर की क्रिया एक यज्ञ की तरह है, जिसमें एक अंग देता है और दूसरा लेता है और वे सभी अन्योन्याश्रित हैं।

श्री कृष्ण, इसलिए कहते हैं (4.24), ‘‘अर्पण का कार्य, हवन, अग्नि, निष्पादक सभी ब्रह्म हैं और यहां तक कि प्राप्त गंतव्य या परिणाम भी ब्रह्म हैं।’’

अहंकार को छोड़ना ही स्वयं को मुक्त करके, ब्रह्म को पाना है।

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