Edited By Rohini Oberoi,Updated: 29 Nov, 2025 10:09 AM

भारत सरकार ने साल 2025 के लिए देश के भूकंप डिज़ाइन कोड में ऐतिहासिक और दूरगामी बदलाव किए हैं। यह तकनीकी सुधार दशकों में सबसे बड़ा माना जा रहा है। इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पूरे हिमालय क्षेत्र को सीधे ज़ोन VI में डाल दिया गया है जिसे भूकंप...
India Earthquake: भारत सरकार ने साल 2025 के लिए देश के भूकंप डिज़ाइन कोड में ऐतिहासिक और दूरगामी बदलाव किए हैं। यह तकनीकी सुधार दशकों में सबसे बड़ा माना जा रहा है। इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पूरे हिमालय क्षेत्र को सीधे ज़ोन VI में डाल दिया गया है जिसे भूकंप के लिहाज़ से सबसे अधिक जोखिम वाला क्षेत्र माना जाता है। यह पहली बार है जब पूरे हिमालय को एक ही उच्चतम भूकंपीय श्रेणी में शामिल किया गया है। यह स्पष्ट संकेत है कि अब देश की भविष्य की इमारतों और शहरी नियोजन में अभूतपूर्व सावधानी बरतनी होगी।
61% भूभाग अब उच्च जोखिम के दायरे में
रिपोर्ट के अनुसार इंडिया अर्थक्वेक ज़ोनिंग मैप 2025 के लागू होने के बाद भारत का लगभग 61 प्रतिशत भूभाग अब मध्यम से अत्यधिक भूकंप जोखिम के दायरे में आ गया है। इस बदलाव में अब तक के इतिहास पर आधारित आकलन के बजाय वर्तमान भूवैज्ञानिक स्थिति और वैज्ञानिक अध्ययन को अधिक महत्व दिया गया है।

हिमालय को सबसे खतरनाक ज़ोन में क्यों रखा गया?
हिमालय क्षेत्र के लिए यह बदलाव आकस्मिक नहीं है बल्कि गहन वैज्ञानिक अध्ययन पर आधारित है:
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अत्यधिक आंतरिक दबाव: नए भूगर्भीय अध्ययन बताते हैं कि हिमालय की सतह भले ही शांत दिखती हो लेकिन इसके भीतर अत्यधिक भूगर्भीय दबाव (Geological Pressure) लगातार सक्रिय है।
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वैज्ञानिक असहमति: पहले इस क्षेत्र को अलग-अलग ज़ोनों में बांटा गया था लेकिन वैज्ञानिकों का मत था कि यह विभाजन ज़मीनी भूकंपीय वास्तविकता को सही ढंग से नहीं दर्शाता।
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सक्रिय फॉल्ट लाइन: नई रिपोर्ट पुष्टि करती है कि हिमालय के भीतर मौजूद फॉल्ट लाइन (Fault Lines) में अभी भी शक्तिशाली भूकंप पैदा करने की क्षमता है यही वजह है कि इसे उच्चतम जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है।
सीमावर्ती शहरों के लिए नया सुरक्षा नियम
नये मानचित्र में एक नया और महत्वपूर्ण प्रावधान जोड़ा गया है जो प्रशासनिक नियमों में बदलाव लाएगा। यदि कोई शहर या इलाका दो भूकंपीय ज़ोनों की सीमा के पास आता है तो उसे स्वतः ही उच्च जोखिम वाली श्रेणी (यानी अधिक खतरनाक ज़ोन) में माना जाएगा। इससे कई ऐसे शहर जो पहले कम संवेदनशील माने जाते थे अब अचानक अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों की सूची में आ गए हैं।

कैसे तैयार हुआ यह आधुनिक मानचित्र?
भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने इस नई ज़ोनिंग को तैयार करने के लिए एक आधुनिक और वैज्ञानिक मॉडल का उपयोग किया है:
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PSHA मॉडल: इसे प्रोबैबिलिस्टिक सीस्मिक हैज़र्ड असेसमेंट (PSHA) मॉडल के आधार पर तैयार किया गया है।
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वैज्ञानिक मापदंड: इस मॉडल में धरती की परतों की मोटाई, प्लेटों के टकराव का दबाव, फॉल्ट लाइन की सक्रियता, तरंगों की गति और संभावित अधिकतम भूकंप जैसी कई वैज्ञानिक जानकारियों का उपयोग किया गया है जो इसे पिछले संस्करणों से कहीं अधिक विश्वसनीय और आधुनिक बनाता है।
नए निर्माणों के लिए सख्त भूकंप-रोधी मानक
2025 के कोड के लागू होते ही देश में निर्माण कार्यों के नियम सख्त हो जाएंगे:
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अनिवार्य भूकंप-रोधी संरचनाएं: अब सभी नई इमारतों को भूकंप-रोधी (Earthquake-resistant) मानकों के अनुसार बनाना अनिवार्य होगा।
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महत्वपूर्ण ढांचागत सुरक्षा: अस्पताल, स्कूल, पुल, पाइपलाइन और अन्य महत्वपूर्ण संरचनाएं इस तरह से डिज़ाइन की जाएंगी कि बड़े भूकंप के बाद भी उनका संचालन बाधित न हो।
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भवनों की मजबूती बढ़ाने और भारी उपकरणों को सुरक्षित रूप से फिट करने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

जनसंख्या आधारित जोखिम आकलन
कोड में एक्सपोज़र विंडो नामक एक नया प्रावधान भी जोड़ा गया है। इसका उद्देश्य जोखिम को केवल भूगर्भीय गतिविधि से नहीं बल्कि इन मानवीय और आर्थिक कारकों से भी आंकना है:
इससे हर शहर के लिए अधिक वास्तविक और सटीक खतरा मानचित्र तैयार हो सकेगा जो भविष्य की आपदा प्रबंधन योजनाओं में बहुत उपयोगी साबित होगा।
दक्षिण भारत में बदलाव कम क्यों?
नई ज़ोनिंग में दक्षिण भारत (प्रायद्वीपीय क्षेत्र) में सबसे कम परिवर्तन किए गए हैं। इसका कारण यह है कि यह क्षेत्र भूगर्भीय रूप से अधिक स्थिर (Geologically more stable) माना जाता है और यहां शक्तिशाली भूकंपों की संभावना कम होती है। इसलिए इसकी जोखिम श्रेणी लगभग पहले जैसी ही बनी हुई है।