Edited By Anu Malhotra,Updated: 08 Jan, 2026 09:25 AM

भारत में मधुमेह (Diabetes) एक महामारी का रूप ले चुकी है, लेकिन अब इसे नियंत्रित करने के लिए दशकों से दी जा रही दवाओं पर ही गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एक हालिया शोध ने चिकित्सा जगत में खलबली मचा दी है, जिसमें दावा किया गया है कि टाइप-2 डायबिटीज की...
नेशनल डेस्क: भारत में मधुमेह (Diabetes) एक महामारी का रूप ले चुकी है, लेकिन अब इसे नियंत्रित करने के लिए दशकों से दी जा रही दवाओं पर ही गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एक हालिया शोध ने चिकित्सा जगत में खलबली मचा दी है, जिसमें दावा किया गया है कि टाइप-2 डायबिटीज की कुछ दवाएं बीमारी को ठीक करने के बजाय उसे और भी पेचीदा बना सकती हैं।
मधुमेह के उपचार में पिछले 7 दशकों से भरोसेमंद मानी जाने वाली सल्फोनिल्यूरिया (Sulphonylureas) समूह की दवाएं अब संदेह के घेरे में हैं। स्पेन की 'यूनिवर्सिटी ऑफ बार्सिलोना' के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पाया है कि ये दवाएं शरीर की प्राकृतिक इंसुलिन प्रणाली को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती हैं।
कैसे काम करती हैं ये दवाएं और कहां हो रही है चूक?
आमतौर पर, ग्लिमेपिराइड, ग्लिपिज़ाइड और विशेष रूप से ग्लाइबेनक्लामाइड जैसी दवाएं अग्न्याशय (Pancreas) की 'बीटा कोशिकाओं' को उत्तेजित करती हैं ताकि वे अधिक इंसुलिन छोड़ सकें। लेकिन शोध के अनुसार, यह प्रक्रिया 'जबरन' कराई जाती है।
कोशिकाओं की थकावट: लंबे समय तक इन दवाओं के सेवन से बीटा कोशिकाएं जीवित तो रहती हैं, लेकिन वे अपनी कार्यक्षमता खो देती हैं। सरल शब्दों में कहें तो, वे इंसुलिन बनाना और छोड़ना बंद कर देती हैं।
जेनेटिक प्रभाव: प्रोफेसर एडुआर्ड मोंटान्या के नेतृत्व में हुए इस शोध के मुताबिक, ये दवाएं उन जीन की सक्रियता को कम कर देती हैं जो इंसुलिन उत्पादन के लिए जिम्मेदार होते हैं।

1950 से जारी है इनका इस्तेमाल
सल्फोनिल्यूरिया दवाओं का इतिहास बहुत पुराना है। 1950 के दशक से ही इन्हें टाइप-2 डायबिटीज के प्राथमिक इलाज के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। शुरुआत में ये दवाएं ब्लड शुगर को तेजी से कम करने में जादुई असर दिखाती हैं। हालांकि, अध्ययन बताता है कि समय बीतने के साथ इनका असर कम होने लगता है और ये साइड इफेक्ट्स का कारण बनने लगती हैं।
डायबिटीज की राजधानी के लिए बड़ी चिंता
भारत, जिसे 'वर्ल्ड डायबिटीज कैपिटल' कहा जाता है, वहां करोड़ों मरीज अपनी डाइट के साथ इन्हीं सस्ती और सुलभ दवाओं पर निर्भर हैं। 'डायबिटीज, ओबेसिटी एंड मेटाबॉलिज्म' जर्नल में प्रकाशित यह रिपोर्ट बताती है कि इन दवाओं के लंबे समय तक संपर्क में रहने से सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है, जिससे शुगर कंट्रोल करना और भी मुश्किल हो जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह शोध दवाओं को तुरंत बंद करने के लिए नहीं, बल्कि उनके दीर्घकालिक प्रभाव को समझने के लिए है।

मरीजों को सलाह दी जाती है कि वे: अपनी मर्जी से कोई भी दवा न बदलें।
-डॉक्टर से इन दवाओं के आधुनिक विकल्पों (जैसे नई पीढ़ी की दवाएं जो बीटा कोशिकाओं पर कम दबाव डालती हैं) के बारे में चर्चा करें।
-जीवनशैली और खानपान में सुधार को ही इलाज का मुख्य आधार बनाएं।