Edited By ,Updated: 22 Nov, 2023 05:03 AM

आज जहां कार्यपालिका और विधायिका लगभग निष्क्रिय हो रही हैं, वहीं न्यायपालिका जनहित के महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकारों को झिंझोडऩे के साथ-साथ शिक्षाप्रद टिप्पणियां कर रही है। इन दिनों जब कुछ राज्यों की सरकारों और वहां के राज्यपालों में तनाव की स्थिति चल...
आज जहां कार्यपालिका और विधायिका लगभग निष्क्रिय हो रही हैं, वहीं न्यायपालिका जनहित के महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकारों को झिंझोडऩे के साथ-साथ शिक्षाप्रद टिप्पणियां कर रही है। इन दिनों जब कुछ राज्यों की सरकारों और वहां के राज्यपालों में तनाव की स्थिति चल रही है, सुप्रीमकोर्ट ने राज्यपालों को उनके अधिकारों की सीमा याद दिलाई है। यूं तो राज्य की कार्यपालिका के प्रमुख राज्यपाल (गवर्नर) होते हैं, परंतु जहां तक उनकी शक्तियों का संबंध है, वे नाममात्र के मुखिया होते हैं। वित्त विधेयक के अलावा कोई अन्य बिल राज्यपाल को उनकी स्वीकृति के लिए पेश करने पर वे या तो उसे अपनी स्वीकृति देते हैं या पुनॢवचार के लिए वापस भेज सकते हैं। सरकार द्वारा दोबारा बिल राज्यपाल के पास भेजने पर उन्हें उसे पारित करना होता है।
कुछ समय से कुछ राज्यों में वहां के सत्तारूढ़ दलों तथा राज्यपालों के बीच टकराव काफी बढ़ रहा है। पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल जगदीप धनखड़, दिल्ली के पूर्व उपराज्यपालों नजीब जंग और वी.के. सक्सेना, झारखंड के रमेश बैंस, तमिलनाडु के आर.एन. रवि, केरल के आरिफ मोहम्मद खान, तेलंगाना की ‘तमिलिसाई सुंदरराजन’ और पंजाब के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित का अपनी राज्य सरकारों से ‘36’ का आंकड़ा बना हुआ है। तेलंगाना सरकार ने विधानसभा द्वारा पारित 10 महत्वपूर्ण विधेयकों को राज्यपाल ‘तमिलिसाई सुंदरराजन’ द्वारा रोकने के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में 20 मार्च, 2023 को दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए 24 अप्रैल को चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ व जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा ने कहा था कि :
‘‘राज्य सरकार के भेजे हुए विधेयकों को राज्यपालों को या तो स्वीकार कर लेना चाहिए या असहमति होने पर वापस भेज देना चाहिए। इन्हें रोक कर रखने का कोई मतलब नहीं है।’’
सुप्रीम कोर्ट के उक्त आदेश के बावजूद विभिन्न राज्यों में राज्यपालों तथा वहां की सरकारों के बीच तनाव जारी है। नवीनतम मामले पंजाब, तमिलनाडु और केरल सरकारों के हैं, जिन्होंने अपने राज्यपालों द्वारा विधिवत पारित विधेयकों को रोकने के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर कर रखी थीं। पंजाब और तमिलनाडु की विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को उनके राज्यपालों द्वारा रोके रखने के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली पीठ ने 10 नवम्बर, 2023 को कड़ी फटकार लगाई।
उन्होंने कहा,‘‘राज्यपाल तथा सरकार के बीच मतभेद लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। सरकार के साथ मिलकर काम करें। आप आग से मत खेलिए। चुनी हुई सरकार द्वारा पारित विधेयक रोकना ठीक नहीं है।’’और अब 20 नवम्बर को सुप्रीम कोर्ट की डी.वाई. चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली पीठ ने विधानसभा में पारित 10 विधेयक लटकाए रखने के बाद वापस सरकार के पास भेजने को लेकर तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि से पूछा कि ये विधेयक 2020 से लम्बित हैं। आखिर आप इन्हें लेकर 3 वर्ष से क्या कर रहे थे? इन विधेयकों में से 2-2 क्रमश: 2020 और 2023 में विधानसभा में पारित किए गए, जबकि शेष 6 अन्य विधेयकों को गत वर्ष विधानसभा में स्वीकृति दी गई थी, राज्यपाल की ओर से लौटाए जाने के बाद विधानसभा ने 18 नवम्बर को विधानसभा का विशेष अधिवेशन बुलाकर सभी 10 विधेयकों को दोबारा पारित करके राज्यपाल को वापस स्वीकृति के लिए भेजा।
इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने केरल विधानसभा से पारित विधेयकों को भी मंजूरी देने में अनिश्चितकालीन देरी करने के मामले में वहां के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान तथा केन्द्र सरकार और राज्यपाल के प्रधान सचिव को नोटिस जारी करके जवाब तलब किया है। राज्यपालों और राज्य सरकारों के बीच कुछ वर्ष पहले तक ऐसा कोई विवाद पैदा नहीं होता था और दोनों ही पक्ष परस्पर सहमति से काम करते थे, परंतु इन दिनों जो कुछ देखने में आ रहा है, उसे किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। अत: अब सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद इस मामले का पटाक्षेप होना ही चाहिए।—विजय कुमार