जजों को किसे नियुक्त करना चाहिए

Edited By Updated: 29 Jan, 2023 04:10 AM

who should appoint the judges

एक स्वतंत्र न्यायपालिका, विश्वसनीय मीडिया, स्वतंत्र चुनाव आयोग, एक बंधनमुक्त संसद, नागरिक स्वतंत्रता, मौलिक स्वतंत्रता की रक्षा और उसके संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध एक प्रबुद्ध कार्यपालिका एक जीवंत लोकतंत्र की पहचान है।

एक स्वतंत्र न्यायपालिका, विश्वसनीय मीडिया, स्वतंत्र चुनाव आयोग, एक बंधनमुक्त संसद, नागरिक स्वतंत्रता, मौलिक स्वतंत्रता की रक्षा और उसके संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध एक प्रबुद्ध कार्यपालिका एक जीवंत लोकतंत्र की पहचान है। भारत के उप-राष्ट्रपति और केंद्रीय कानून मंत्री दोनों ने हाल ही में न्यायपालिका पर सीधा हमला किया है। उप-राष्ट्रपति ने बार-बार मूल संरचना सिद्धांत पर सवाल उठाया है, जबकि कानून मंत्रीने बार-बार उच्चतम न्यायालय और  उच्च न्यायपालिका में नियुक्त पदधारियों को चुनौती दी है। बदले में सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायाधीशों के संबंध में अपनी दोहराई गई सिफारिशों को सार्वजनिक करने के लिए चुना है जिनकी नियुक्तियों पर सरकार 5 साल से अधिक समय से बैठी है। 

विशेष रूप से दिल दहलाने वाला दिल्ली उच्च न्यायालय के वकील सौरभ कृपाल का मामला है जिनकी उम्मीदवारी उनके यौन रुझान के कारण सरकार द्वारा संसाधित नहीं की जा रही। उनके पार्टनर जोकि एक स्विस नागरिक हैं, का खुफिया एजैंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) द्वारा कथित रूप से सर्वेक्षण किया गया था जिसकी स्पष्ट तौर पर बाहरी सीमा है और उसे भारत में विदेशी नागरिकों के आचरण की जांच नहीं करनी चाहिए। संविधान का अनुच्छेद 124 (2) न्यायाधीशोंकी नियुक्ति की प्रक्रिया को निर्धारित करता है। हालांकि ‘भारत  के मुख्य न्यायाधीश से हमेशा परामर्श किया जाएगा’ के सूत्रीकरण पर एक स्थानक विवाद रहा है। 

1998 में सर्वोच्च न्यायालय ने भारत के राष्ट्रपति द्वारा एक संदर्भ पर एक सलाहकार राय में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कालेजियम का विस्तार और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के स्थानांतरण की बात की जिसे कि बोलचाल की  भाषा में तीसरे न्यायाधीशों के मामले के रूप में जाना जाता है। 2010 में तत्कालीन यू.पी.ए. सरकार ने भी संसद में न्यायियक मानक और जवाबदेही विधेयक (जे.एस.ए.बी.) 2010 पेश किया था और इसे अंतिम समय में वापस लेने के लिए लगभग पारित कर दिया था। इस तरह यह अगस्त 2014 तक बना रहा जब तक कि तत्कालीन एन.डी.ए./भाजपा कानून मंत्री ने उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति में संतुलन बहाल करने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक आयोग नियुक्ति विधेयक (एन.जे.ए.सी.) और 121वां संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश किया। 

एन.जे.ए.सी. बिल को संसद द्वारा लगभग सर्वसम्मति से पारित किया गया था। भारत के राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृत और 16 राज्यों द्वारा इसकी पुष्टि की गई थी, परन्तु इसे अक्तूबर 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने 4-1 के बहुमत से यह कह कर खारिज कर दिया था कि न्यायपालिका सरकार के प्रति ‘ऋणग्रस्तता के जाल’ में फंसने का जोखिम नहीं उठा सकती। एन.जे.ए.सी. के फैसले को कभी-कभी चौथे न्यायाधीशों के मामले के रूप में जाना जाता है। 

शायद एन.जे.ए.सी. मामले में 1000 से अधिक पन्नों के फैसले और 1981 के बाद के पूर्ववर्ती दस्तावेजों से पूरी तरह से वाकिफ न रहते हुए वर्तमान केंद्रीय कानून मंत्री ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर कॉलेजियम प्रणाली में कार्यपालिका की भूमिका की मांग कर डाली। उन्होंने बाद में स्पष्ट किया कि मैमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (प्रक्रियाओं का ज्ञापन) में उल्लेखित कॉलेजियम प्रणाली के पुनर्गठन के लिए लिखा था। फिलहाल मामला वहीं कायम है। 

फिर आखिर न्यायाधीशों की नियुक्ति किस प्रकार की जानी चाहिए? उन्हें स्वयं न्यायाधीशों द्वारा नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि इस प्रथा के पक्ष में चाहे जो भी तर्क हों, यह शक्तियों के पृथक्करण के संवैधानिक सिद्धांत के खिलाफ है जो नियंत्रण और संतुलन के सिद्धांत के केंद्र में है। विडम्बना यह है कि विधायिका जो सम्प्रभु की इच्छा की अभिव्यक्ति है, की इस प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं है सिवाय इसके कि जब किसी न्यायाधीश को हटाने की बात आती है तो वह भी महाभियोग की प्रक्रिया के माध्यम से होती है। यहां तक कि संसद में न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा करना संवैधानिक रूप से प्रतिबंधित है। 

इसलिए एक सुंदर समाधान शायद यह हो सकता है कि पुष्टि प्रक्रिया के माध्यम से न्यायाधीशों की नियुक्ति में संसद को भूमिका दी जानी चाहिए। एक उपयुक्त संवैधानिक संशोधन लाकर एक संयुक्त सदन न्यायपालिका समिति का गठन किया जाना चाहिए। इस समिति में राज्यों की परिषद के अध्यक्ष, लोकसभा के अध्यक्ष, लोकसभा और राज्यसभा के 2-2 सदस्य (ट्रैजरी बैंच से एक और विपक्षी बैंच से एक) शामिल होने चाहिएं। निर्णायक मत समिति के अध्यक्ष का होगा।

भारत के राष्ट्रपति द्वारा कोई न्यायिक वारंट तब तक जारी नहीं किया जाएगा जब तक कि न्यायपालिका समिति उचित पुष्टि सुनवाई के बाद प्रत्येक न्यायाधीशों की नियुक्ति को मंजूरी नहीं दे देती। रद्द किए गए जे.एस.ए.बी. बिल में शामिल किए गए कुछ कार्य भी इस समिति को सौंपे जा सकते हैं। इस प्रकार विधायिका के माध्यम से कार्यपालिका,जिसके प्रति वह हर हाल में जवाबदेह भी है, न्यायिक नियुक्तियों में हितकर विचार का प्रयोग कर सकती है।-मनीष तिवारी             
 

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