ऊंची पहाड़ी के अंदर बना है अन्नपूर्णा माता का ये मंदिर, जानिए 10 सितंबर से क्या है इसका कनेक्शन

Edited By Updated: 17 Nov, 2022 03:06 PM

annapurna mata temple balaghat

सतपुड़ा के घने जंगलों और पहाड़ों पर हिन्दू देवी देवताओं का वास है। जहां दूर दराज से श्रद्धालु दर्शन को पहुंचते हैं। कहा जाता है हिन्दू धर्म में 33 कोटि देवी-देवता है जिनके भारत के साथ-साथ अनेकों देशों में प्राचीन धार्मिक स्थल मौजूद हैं।

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सतपुड़ा के घने जंगलों और पहाड़ों पर हिन्दू देवी देवताओं का वास है। जहां दूर दराज से श्रद्धालु दर्शन को पहुंचते हैं। कहा जाता है हिन्दू धर्म में 33 कोटि देवी-देवता है जिनके भारत के साथ-साथ अनेकों देशों में प्राचीन धार्मिक स्थल मौजूद हैं। आज हम बात करने जा रहे हैं इन्हीं देवी-देवताओं की गिनती में शामिल माता अन्नपूर्णी से जुड़े एक बेहद खास मंदिर की। धार्मिक पुराणों व ग्रंथों मे इन्हें अन्न की देवी कहा गया है। जिन्हें समर्पित पर्व अन्नपूर्णा जयंती हर साल मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा इस वर्ष 08 दिसंबर को मनाया जाता है। ततो आइए बिना देर किए जानते हैं इनके इस खास मंदिर के बारे में-           PunjabKesari
देवी-देवताओं के अनेकों धामो में एक धाम मां अन्नपूर्णा का भी है। जो बालाघाट जिला मुख्यालय से लगभग 20 कि.मी. दूर गड़दा बुढेना की पहाड़ी पर विराजमान है। यहां पहुंचने वाले भक्तों में मान्यता है। कि जो भी भक्त सच्चे मन से यहां आकर मातारानी की पूजा आराधना करता है। उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। यहां माता के दरबार मे हीरों जेवरातों से भरा खजाना होने और यहां माता की सवारी बाघ को माता के धाम पत्थरों की गुफा में कई बार देखने का दावा भी ग्रामीण करते हैं। इसलिये मां अन्नपूर्णा को मुरादों वाली और खजाने वाली माता भी कहा जाता।

चैत्र नवरात्रि व शारदीय नवरात्रि महापर्व के दौरान ये मंदिर पूरी तरह से सच्ची आस्था और श्रद्धा का प्रतीक के रूप में दिखाई देता है। दूर दराज और अन्य प्रदेशों से श्रद्धालु विभिन्न धामों में माता रानी के दरबार मे मन्नत लेकर पहुंचते हैं। सतपुड़ा के घने जंगल और ऊंची पहाड़ी पर स्थित मुरादों वाली मां अन्नपूर्णा का दरबार निश्चित ही सच्ची आस्था और श्रद्धा का केंद्र बना है। यहां संतान होने की मन्नत पूरी होने पर हर वर्ष आने वाले भक्तों ने कई दिन दुखियों की मुराद पूरी होने की जानकारी दी।

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स्थानीय लोगों की मानें तो 10 सितम्बर का दिन, इस धाम के लिए ऐतिहासिक दिन माना जाता है। दरअसल बताया जाता है कि वर्ष 2006 में मां अन्नपूर्णा ने गांव के ही वीर सिंह नाम के शख्स को सपने में प्रकट होने की जानकारी दी थी। उसके बाद लोगों ने उक्त स्थान पर जाकर देखा तो मां अन्नपूर्णा की मूर्ति नजर आई। बस तभी से लोगों ने अन्नपूर्णा देवी की पूजा अर्चना शुरू कर दी और आज इस धाम की कीर्ति दूर दूर तक फैल रही है। मंदिर के पुजारी वीर सिंह अडमें द्वारा बताया जाता है कि कैसे माता उनके सपने में आईं और कैसे माता को कन्या के रूप में साक्षात देखने के बाद इस धाम में पूजा शुरू हुई। सच्ची आस्था और श्रद्धा के केंद्र बने मां अन्नपूर्णा के इस दरबार की कीर्ति दूर दूर तक फैल चुकी है और कई प्रकार की मन्नतें लेकर श्रद्धालु माता के दर्शन को आते हैं । शारदीय नवरात्र का पर्व हो या फिर चैत्र नवरात्र का वर्ष भर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। 

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