Naimisharanya Dham: वेद-पुराण, रामायण और महाभारत से जुड़ा पवित्र तीर्थ है नैमिषारण्य

Edited By Updated: 13 Jan, 2026 12:27 PM

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Naimisharanya Dham: धार्मिक घटनाओं के साथ वैदिक साहित्य की रचनाओं से भी जुड़ा हुआ भारत का एक ऐसा पौराणिक-ऐतिहासिक धार्मिक स्थल जो बिल्कुल अज्ञात तो नहीं लेकिन नई पीढ़ी की सहज जानकारी में भी नहीं है- वह है नैमिषारण्य धाम। नीमेसर के नाम से भी जाना...

Naimisharanya Dham: धार्मिक घटनाओं के साथ वैदिक साहित्य की रचनाओं से भी जुड़ा हुआ भारत का एक ऐसा पौराणिक-ऐतिहासिक धार्मिक स्थल जो बिल्कुल अज्ञात तो नहीं लेकिन नई पीढ़ी की सहज जानकारी में भी नहीं है- वह है नैमिषारण्य धाम। नीमेसर के नाम से भी जाना जाता यह स्थान उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 90 किलोमीटर की दूरी पर सीतापुर जिले में स्थित है।

Naimisharanya

यहीं चारों वेदों, 18 पुराणों, असंख्य शास्त्रों और अन्य कई धार्मिक ग्रंथों की रचनाएं हुई हैं। जहां पुरातन काल में सूत जी महाराज शौनिक आदि अपने अट्ठासी हजार ऋषियों को निरंतर प्रवचन के दौरान पौराणिक इतिहास की कहानी सुनाया करते थे। धार्मिक ग्रंथों की रचनाएं करते थे। यहीं पर भगवान राम ने अपना अश्वमेघ यज्ञ पूर्ण किया था।

रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि से उनकी मुलाकात का स्थान भी नैमिषारण्य को ही बताया गया है तथा अपने पुत्रों लव और कुश से भगवान राम की मुलाकात भी इसी स्थान पर हुई थी।

गोमती नदी के किनारे स्थित यह प्रसिद्ध हिंदू तीर्थ जिसका मार्कंडेय पुराण में अनेक बार अट्ठासी हजार ऋषियों की तपस्थली के रूप में नाम आया है, वायु पुराण तथा वृहद पुराण के अनुसार ऋषियों के स्वाध्याय अनुष्ठान का मुख्य स्थान बताया गया है। वराह पुराण के अनुसार यहां भगवान द्वारा निमेष मात्रा में दोनों का संहार होने से नैमिषारण्य कहलाया।
 
नैमिषारण्य का प्राचीनतम उल्लेख वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड में है कि लव और कुश ने गोमती नदी के किनारे राम के अश्वमेघ यज्ञ में सात दिनों में वाल्मीकि रचित रामायण काव्य का गायन किया था।

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एक कथा क्रम के अनुसार महर्षि सनक के मन में दीर्घकाल तक ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा थी। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें एक चक्र दिया और कहा कि इसे चलाते हुए चले जाओ जहां इस चक्र की नमी यानी बाहरी प्रदीप गिर जाएगी। उस स्थान को पवित्र समझ कर वहीं पर आश्रम बनाकर ज्ञान सत्र करो।

सनक जी के साथ अट्ठासी हजार ऋषि भी थे। यह सब उस चक्र को चलाते हुए भारत में घूमने लगे। तब गोमती नदी के किनारे स्थित एक तपोवन में चक्र की नमी गिर गई और वहीं पर यह चक्र भूमि में प्रवेश कर गया। चक्र की नमी गिरने से वह तीर्थ नैमिष कहलाया तथा वह स्थान जहां चक्र भूमि प्रवेश कर गया चक्र तीर्थ कहलाया। यह तीर्थ गोमती नदी के वाम तट पर है और 51 पितृ स्थान में से एक माना जाता है, जहां सोमवती अमावस्या को मेला भी लगता है।

यह पवित्र स्थान सदियों से असंख्य तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता रहा है विशेषकर अमावस्या, नवरात्रि आदि जैसे पवित्र अवसरों पर। यहां ऋषि शृंग ने भी तपस्या की थी। चक्र तीर्थ नैमिषारण्य के सबसे महत्वपूर्ण पवित्र स्थानों में से एक है जिन लोगों ने भी सत्यनारायण व्रत कथा सुनी है उन्होंने नैमिषारण्य के बारे में जरूर सुना होगा।

उस कथा का वाचन सबसे पहले नैमिषारण्य में हुआ था। यह कथा स्कंद पुराण में है। हिंदू परम्पराओं के अनुसार वेदों को चार भागों में विभाजित किया गया था और पुराण नैमिषारण्य  में ऋषि वेद व्यास द्वारा लिखे गए थे। नैमिषारण्य  के पास मिश्रिख का धार्मिक महत्व इस मान्यता के कारण है कि महर्षि दधीच ने वज्र बनाने के लिए अपनी हड्डियां देवताओं को दान कर दी थीं।

मिश्रिख में हत्याहरण तीर्थम का बहुत महत्व है। ऐसा माना जाता है कि यहां राम ने रावण को मारने के पाप से खुद को शुद्ध करने के लिए स्नान किया था।

यह जिला 1857 के भारतीय विद्रोह में प्रमुखता से सामने आया था। जब छावनियों में मौजूद सैनिकों ने अपने अधिकारियों पर गोलीबारी की थी जिनमें से कई मारे गए थे।

साथ ही कई सैन्य और नागरिक अधिकारी भी अपने परिवारों के साथ भागने की कोशिश में मारे गए थे। नैमिष के अन्य पवित्र स्थानों जैसे ललिता देवी मंदिर और अन्य स्थानों पर जाने से पहले श्रद्धालु तीर्थयात्री चक्र तीर्थ में पवित्र डुबकी लगाते हैं।

यहां देवी मां ललिता देवी ने तपस्या की थी और मंदिर के रूप में उनका निवास स्थान है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ललिता देवी की पूजा करते समय आदि शंकराचार्य ने ‘ललिता पंचकम’ नामक अपने प्रसिद्ध स्रोत (भक्ति प्रार्थना) का पाठ किया। यहां चक्र तीर्थ के आसपास चक्रनारायण, गणेश, राम, लक्ष्मण के मंदिर हैं।

पास में ही वेद व्यास का मंदिर है, जिसे व्यास गद्दी के नाम से जाना जाता है। यहीं पर ऋषि वेद व्यास ने वेदों को चार भागों में विभाजित किया और पुराण भी लिखे। वहां पुराण मंदिर भी हैं।

महाभारत का पाठ पहली बार यहीं हुआ था और नैमिषारण्य का उल्लेख महाभारत और रामायण दोनों में बार-बार मिलता है। सूत गद्दी पर ऋषि सूत और शौनक के प्रवचन होते थे। मनु और उनकी पत्नी शतरूपा ने यहां तपस्या की थी। यहीं पर स्थित श्री हनुमानगढ़ी के पास ही भगवान हनुमान की बड़ी मूर्ति स्थित है। प्रचलित मान्यता के अनुसार अहि रावण को मारने के बाद हनुमान पाताल से भगवान राम और लक्ष्मण के साथ इसी स्थान पर प्रकट हुए थे।

9वीं सदी के तिरुमंगईलवार ने तमिल में कुल 10 छंदों में नैमिषारण्य को विष्णु के निवासों में से एक के रूप में गाया है। तिरुमंगई अलवर विष्णु को नैमिसारण्यड्डल्ल एन ताई के रूप में संदर्भित करता है। श्री वैष्णव परम्परा में एक अहोबिला मैडम और एक रामानुज कूटम यहां स्थित है।

उपरोक्त के अलावा यहां एक सुंदर वेंकटेश्वर (बाला जी) मंदिर निर्माणाधीन है जो यहां दक्षिण भारतीय मंदिर के नाम से अधिक प्रसिद्ध है। जो लोग तिरुपति या तिरुमाला में भगवान के दर्शन करने के लिए भाग्यशाली नहीं हैं, वे निमसर बालाजी मंदिर में शांति से दर्शन कर सकते हैं। हर साल फरवरी और नवम्बर के दौरान साल में दो बार विशेष पूजा और कल्याणम् आयोजित किए जाते हैं।

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चौरासी कोस की परिक्रमा
नैमिषारण्य तीर्थ की परिक्रमा चौरासी कोस की होती है जो प्रतिवर्ष व्यास शुकदेव के स्थान से शुरू होती है। मंदिर में भीतर शुकदेव जी की और बाहर व्यास जी की गद्दी है तथा पास में मनु और शतरूपा के चबूतरे हैं। यहीं ब्रह्मावर्त सूखा सरोवर। गंगोत्तरी, सूखा सरोवर रेत से भरा। पुष्कर सरोवर है गोमती नदी।

दशाश्वमेध टीला :  टीले पर एक मंदिर में श्रीकृष्ण और पांडवों की मूर्तियां हैं।

चारों धाम मंदिर : भारत के चारों दिशाओं में आदि शंकराचार्य जी के द्वारा स्थापित चारों धाम मंदिर नैमिषारण्य में महर्षि गोपाल दास जी के द्वारा स्थापित चारों धाम जगन्नाथ धाम, बद्रीनाथ धाम, द्वारिकाधीश धाम तथा रामेश्वरम धाम एक साथ दर्शन।

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सूत जी का स्थान : एक मंदिर में सूत जी की गद्दी है। वहीं राधा कृष्ण तथा बलराम जी की मूर्तियां हैं। यहां स्वामी श्री नारद नंद जी महाराज का आश्रम तथा एक ब्रह्मचर्याश्रम भी है जहां ब्रह्मचारी प्राचीन पद्धति से शिक्षा प्राप्त करते हैं। आश्रम में साधक लोग साधना की दृष्टि से रहते हैं। धारणा है कि कलियुग में समस्त तीर्थ नैमिष क्षेत्र में ही निवास करते हैं।

त्रिशक्ति मंदिर भी देखने योग्य है। इसमें दक्षिण भारत की कलाकृति देखने लायक है।

कैसे पहुचें : उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। नियमित अंतराल पर बहुत सारी टैक्सियां और बसें उपलब्ध हैं।

सनातन धर्म का मूल उसकी जड़ें दिन वेदों पुराणों और शास्त्रों से प्रकट हुई है उन सबका रचना स्थल धार्मिक रूप से कितना महत्वपूर्ण आध्यात्मिक महत्व का और पवित्र होगा यह सहज ही समझा जा सकता है।  

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