Edited By Sarita Thapa,Updated: 01 Feb, 2026 03:56 PM

जीवन के सफर में सबसे गहरा घाव तब लगता है, जब कोई ऐसा व्यक्ति हमसे दूर चला जाता है जिसे हम अपनी जान से भी ज्यादा चाहते हैं। चाहे वह मृत्यु की वजह से हो या रिश्तों में आई कड़वाहट के कारण, बिछड़ने का यह खालीपन इंसान को मानसिक और भावनात्मक रूप से तोड़...
Premanand Ji Maharaj Quotes : जीवन के सफर में सबसे गहरा घाव तब लगता है, जब कोई ऐसा व्यक्ति हमसे दूर चला जाता है जिसे हम अपनी जान से भी ज्यादा चाहते हैं। चाहे वह मृत्यु की वजह से हो या रिश्तों में आई कड़वाहट के कारण, बिछड़ने का यह खालीपन इंसान को मानसिक और भावनात्मक रूप से तोड़ देता है। ऐसे कठिन समय में, जब मन अशांत हो और कोई रास्ता न सूझे, तब वृंदावन के संत श्री हित प्रेमानंद जी महाराज के विचार एक शीतल मरहम की तरह काम करते हैं। महाराज जी कहते हैं कि संसार में कोई भी वियोग बेवजह नहीं होता, इसके पीछे नियति का एक गहरा संकेत छिपा होता है। उनके प्रवचन हमें सिखाते हैं कि कैसे हम अपनी इस अटूट पीड़ा को आध्यात्मिक शक्ति में बदल सकते हैं और उस परम सत्य को पहचान सकते हैं जो कभी हमसे अलग नहीं होता। तो आइए जानते हैं प्रेमानंद जी महाराज के वे अनमोल सूत्र, जो बिछड़ने के दुख को सहने की शक्ति देते हैं और अशांत मन को फिर से शांति की राह दिखाते हैं।
संसार के 'मिटने वाले' स्वभाव को स्वीकार करें
महाराज जी अक्सर कहते हैं कि यह संसार नश्वर है। यहां जो कुछ भी आंखों से दिखाई दे रहा है, उसका अंत निश्चित है। हम जिसे अपना मानकर पकड़ते हैं, वह असल में कुछ समय के लिए ईश्वर द्वारा दी गई भेंट है। जब हम इस सत्य को गहराई से स्वीकार कर लेते हैं कि यहां कुछ भी स्थायी नहीं है, तो मन का बोझ हल्का होने लगता है।
प्रेम और मोह के अंतर को समझें
अक्सर जिसे हम प्रेम समझते हैं, वह केवल मोह होता है। महाराज जी के अनुसार, मोह में स्वार्थ होता है कि वह व्यक्ति हमारे पास रहे, लेकिन सच्चा प्रेम निस्वार्थ होता है। यदि आप किसी से प्रेम करते हैं, तो उसकी खुशी में खुश रहें, चाहे वह आपके पास हो या दूर। वह जहाँ भी रहे, उसके मंगल की कामना करना ही सच्चा प्रेम है।
प्रारब्ध का खेल स्वीकार करें
महाराज जी समझाते हैं कि हर व्यक्ति का हमारे जीवन में आना और जाना हमारे 'प्रारब्ध' (Karma) से तय होता है। किसी का साथ केवल उतने ही समय के लिए होता है, जितना लेन-देन शेष है। जब हिसाब पूरा हो जाता है, तो विधाता उसे हमसे दूर कर देता है। इसे ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करने में ही बुद्धिमानी है।

खालीपन को नाम जप से भरें
जब कोई प्रिय व्यक्ति जाता है, तो हृदय में एक शून्य पैदा होता है। महाराज जी का कहना है कि उस शून्य को दुनिया की बातों से नहीं, बल्कि भगवत नाम से भरें। जिस प्रेम की तलाश आप एक हाड़-मांस के पुतले में कर रहे थे, उसे राधा वल्लभ या अपने ईष्ट में खोजें। भगवान वह एकमात्र संबंधी हैं जो कभी साथ नहीं छोड़ते।
शरीर नहीं, आत्मा से जुड़ें
प्रेमानंद जी महाराज अक्सर कहते हैं कि शरीर तो पंचतत्व का बना है जो आज नहीं तो कल नष्ट होगा ही। यदि वह व्यक्ति जीवित है और आपसे दूर है, तो याद रखें कि उनकी आत्मा और आपकी आत्मा का मूल स्रोत एक ही है। प्रार्थना में बड़ी शक्ति होती है; आप प्रार्थना के माध्यम से उनसे जुड़ सकते हैं।
वर्तमान में जीना सीखें
बीते हुए समय को याद करके रोना केवल समय की बर्बादी है। महाराज जी के अनुसार, दुःख का सबसे बड़ा कारण स्मृति है। वे सलाह देते हैं कि वर्तमान में अपने कर्तव्यों का पालन करें और जो लोग अभी आपके पास हैं, उनकी सेवा में खुद को लगाएं।

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