Edited By Prachi Sharma,Updated: 24 Jan, 2026 01:29 PM

Vidur Niti : महात्मा विदुर, जिन्हें धर्मराज का अवतार माना जाता है, महाभारत काल के सबसे बुद्धिमान और दूरदर्शी विचारकों में से एक थे। महाराजा धृतराष्ट्र को दिए गए उनके उपदेश, जिन्हें हम विदुर नीति के नाम से जानते हैं, आज के आधुनिक समय में भी उतने ही...
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Vidur Niti : महात्मा विदुर, जिन्हें धर्मराज का अवतार माना जाता है, महाभारत काल के सबसे बुद्धिमान और दूरदर्शी विचारकों में से एक थे। महाराजा धृतराष्ट्र को दिए गए उनके उपदेश, जिन्हें हम विदुर नीति के नाम से जानते हैं, आज के आधुनिक समय में भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने हजारों साल पहले थे। विदुर जी का मानना था कि इंसान का व्यवहार ही उसके भाग्य का निर्माता होता है। समाज में प्रतिष्ठा कमाना कठिन है लेकिन उसे खोना बहुत आसान। विदुर नीति के अनुसार, मनुष्य की कुछ आदतें ऐसी होती हैं जो न केवल समाज में उसकी छवि खराब करती हैं बल्कि उसके सबसे करीबी लोगों को भी उससे दूर कर देती हैं।
कठोर वाणी और अपशब्दों का प्रयोग
विदुर जी कहते हैं कि वाणी में वह शक्ति है जो मित्र को शत्रु और शत्रु को मित्र बना सकती है। जो व्यक्ति अपनी जुबान पर नियंत्रण नहीं रखता और दूसरों के प्रति कठोर शब्दों का प्रयोग करता है, उसकी छवि समाज में एक अहंकारी व्यक्ति की बन जाती है। कड़वे शब्द कान में नहीं, सीधे दिल में चुभते हैं। विदुर जी के अनुसार, शस्त्र का घाव भर सकता है लेकिन वाणी का घाव कभी नहीं भरता। यदि आप अपनों से बात करते समय मर्यादा भूल जाते हैं, तो धीरे-धीरे आपके दिल के करीबी लोग आपसे बात करना बंद कर देंगे।
ईर्ष्या और दूसरों की निंदा करना
समाज में छवि खराब करने वाली दूसरी सबसे बड़ी आदत है दूसरों की प्रगति से जलना और उनकी पीठ पीछे बुराई करना। विदुर नीति के अनुसार, जो व्यक्ति दूसरों के दोष ढूंढने में अपना समय नष्ट करता है, वह स्वयं कभी उन्नति नहीं कर पाता। जब आप किसी तीसरे व्यक्ति की बुराई अपने मित्र से करते हैं, तो आपका मित्र भी असुरक्षित महसूस करने लगता है। उसे लगता है कि आप उसकी पीठ पीछे भी ऐसा ही करते होंगे। इससे विश्वास की नींव हिल जाती है। ईर्ष्या एक ऐसी आग है जो पहले उसे जलाने वाले को ही राख करती है। नकारात्मक चर्चा करने वाले व्यक्ति को समाज में 'विश्वसनीय' नहीं माना जाता।

अत्यधिक क्रोध और आवेश
विदुर नीति में क्रोध को नरक का द्वार बताया गया है। क्रोध में मनुष्य की सोचने-समझने की शक्ति नष्ट हो जाती है। एक पल का गुस्सा सालों के बने-बनाये रिश्तों को एक झटके में तोड़ सकता है। जो व्यक्ति छोटी-छोटी बातों पर उग्र हो जाता है, लोग उससे डरने लगते हैं, सम्मान नहीं करते। डर और सम्मान में बहुत अंतर है। जब लोग आपसे डर के कारण जुड़ते हैं, तो मौका मिलते ही वे आपका साथ छोड़ देते हैं। बार-बार क्रोध करने वाले व्यक्ति को समाज में 'अस्थिर मानसिक स्थिति' वाला माना जाता है, जिससे उसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलना बंद हो जाती हैं।
आलस्य और टालमटोल की प्रवृत्ति
अक्सर लोग आलस्य को केवल एक व्यक्तिगत कमी मानते हैं, लेकिन विदुर जी के अनुसार, आलस्य आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा का सबसे बड़ा शत्रु है। जो व्यक्ति समय की कद्र नहीं करता और अपने कर्तव्यों को टालता रहता है, वह समाज में अपनी विश्वसनीयता खो देता है। यदि आप अपनों को दिया गया वचन आलस्य के कारण पूरा नहीं करते, तो आप अपना प्रभाव खो देते हैं। लोग आप पर भरोसा करना छोड़ देते हैं और आपको एक 'गैर-जिम्मेदार' व्यक्ति के रूप में देखने लगते हैं। आलसी व्यक्ति को लक्ष्मी और सरस्वती दोनों त्याग देती हैं। समाज केवल सफल और कर्मठ व्यक्ति का ही सम्मान करता है।
