Edited By Niyati Bhandari,Updated: 04 Oct, 2023 10:24 AM

प्रकृति के नियमानुसार, जो देता है वह पाता है, जो रोकता है वह सड़ता है। इसका सुंदर क्रियान्वयन अनादि काल से हम देखते आए हैं कि कैसे धरती अपना जीवन-तत्व वनस्पति को देती है,
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Smile please: प्रकृति के नियमानुसार, जो देता है वह पाता है, जो रोकता है वह सड़ता है। इसका सुंदर क्रियान्वयन अनादि काल से हम देखते आए हैं कि कैसे धरती अपना जीवन-तत्व वनस्पति को देती है, वृक्ष प्राणियों को फल-फूल, पत्ते देते हैं, समुद्र बादलों को देता है, उस घाटे को नदियां अपना जल देकर पूरा किया करती हैं। हिमालय अपनी बर्फ गला कर नदियों को देता है, हिमालय पर बर्फ जमाने का क्रम प्रकृति जारी रखती है, ताकि नदियों को जल देते रहने की उसकी दानवीरता में कमी न आए। यह सब सुनकर मन से यही उद्गार निकलते हैं कि ‘धन्य है मां प्रकृति, जो सिर्फ देना ही देना जानती है।’

इसके विपरीत मनुष्य, जिसे विश्व की सर्वश्रेष्ठ रचना माना जाता है, केवल ‘लेना ही लेना’ जानता है। क्यों? क्योंकि देने का समय जब आता है, तब उसका मुख फीका पड़ जाता और दिल छोटा हो जाता है, क्या यह सच नहीं ?
जब कुछ लेने का प्रसंग होता है, तब हममें से कोई भी कीमत के बारे में नहीं सोचता, लेकिन जब हमारे देने की बारी आती है, तब हम गिन-गिन कर और अच्छे से हिसाब लगाकर देते हैं। लेने वाले के रूप में हम सामने वाले को बिना कुछ दिए ही, अपना पूरा जोर लगाकर जितना उनसे हासिल कर सकते हैं, उतना कर लेते हैं और इसी कारण ऐसे लोगों को उदारचित्त नहीं माना जाता क्योंकि उनकी यह एक मानसिकता होती है कि ‘मुझे यहां से क्या मिलेगा?’ ऐसे लोग हर बात में अपना ही स्वार्थ ढूंढते हैं, जिससे फिर समाज उनसे दूरी बनाए रखता है। इसके बिल्कुल विपरीत, देने वाले देवता इतने नि:स्वार्थ होते हैं कि अपना सब कुछ लुटाने के बाद भी उन्हें एक प्रकार की आंतरिक संतुष्टि व सुख की अनुभूति होती है, क्योंकि देने से जो दुआएं प्राप्त होती हैं, उसके सामने बड़े से बड़े भौतिक सुख भी फीके पड़ जाते हैं। इसलिए हमें देने के संस्कार को अपने भीतर उजागर करना और अपनी मौजूदा पीढ़ी के अंदर भी इसके बारे में जागरूकता बढ़ानी चाहिए।

आज के समय का यह एक दुर्भाग्यपूर्ण सत्य है कि हमने अपनी मौजूदा पीढ़ी को अपना उचित हिस्सा दिए बिना सामने वाले से सिर्फ लेने के कार्य में ही प्रशिक्षित किया है। इसीलिए आज समाज में थोड़ा देकर अधिक लेने की कुप्रथा प्रचलित हो गई है परन्तु, अपनी यह होशियारी दिखाने में हम इस सार्वभौमिक कानून को भूल जाते हैं कि इस दुनिया में कुछ भी मुफ्त नहीं आता, कभी न कभी और समय पर उसकी कीमत चुकानी ही पड़ती है। जो हवा हम श्वास द्वारा अंदर लेते हैं, उसकी भरपाई सांस छोड़कर हमें करनी ही पड़ती है। इसमें सिर्फ लेना ही लेना संभव नहीं है।
यदि हम सभी प्रकृति के लेन-देन के इस सरल नियम को समझ लें तो जीवन जीना आसान हो जाएगा, अन्यथा सिर्फ लेने की प्रवृत्ति हमें नरक के द्वारा पर ले जाकर खड़ा कर देगी। याद रखें, आज का दिया हुआ भविष्य में असंख्य गुना होकर मिलना ही है। विश्वास रखने वाले की झोली कभी खाली नहीं होती, प्रकृति उसकी भरपाई करती ही है।
