उसने मुझे खिलौना बनाकर खेला... आरोपी को सजा सुनाने के बाद जज ने कविता में बयां किया मासूम का दर्द

Edited By Updated: 12 Apr, 2025 04:21 PM

after sentencing accused judge expressed pain of innocent in poem

मध्य प्रदेश के नयापुरा गाँव में 6 साल की एक मासूम बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म और हत्या के मामले में कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने शुक्रवार को आरोपी को फांसी की सजा सुनाई है। इस मामले में तेजी दिखाते हुए अदालत ने केवल 88 दिनों के भीतर अपना...

नेशनल डेस्क. मध्य प्रदेश के नयापुरा गाँव में 6 साल की एक मासूम बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म और हत्या के मामले में कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने शुक्रवार को आरोपी को फांसी की सजा सुनाई है। इस मामले में तेजी दिखाते हुए अदालत ने केवल 88 दिनों के भीतर अपना फैसला सुना दिया।

अदालत ने आरोपी पर 3 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया और बच्ची के माता-पिता को 4 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। फैसला सुनाते हुए जज ने बच्ची के दर्द को बयां करती हुई एक मार्मिक कविता भी पढ़ी।

जिला अभियोजन अधिकारी राजकुमार नेमा ने घटना की जानकारी देते हुए बताया कि 2 जनवरी 2025 को बच्ची अपने मामा के घर आई थी। आरोपी तो बच्ची की माँ और मामा ने पहले घर से भगा दिया था क्योंकि वह पलंग के नीचे सोया हुआ था, जाते-जाते धमकी देकर गया था कि उसे लड़की चाहिए। उस रात बच्ची को उसकी माँ ने प्यार से सुला दिया था। कुछ देर बाद आरोपी बच्ची को उठाकर ले गया। वह उसे जंगल में ले गया, जहाँ उसने उसके साथ दुष्कर्म किया और फिर उसकी हत्या कर दी।

बच्ची की माँ ने तुरंत आरोपी पर शक जताया था। पुलिस ने उसी रात गाँव से आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ में उसने दुष्कर्म और हत्या की बात कबूल कर ली। इस मामले में शासन की ओर से विशेष लोक अभियोजक मनोज जाट ने पैरवी की। वकीलों ने आरोपी का केस न लड़ने का फैसला किया था।

जज की मार्मिक कविता

2 और 3 जनवरी की थी वो

दरमियानी रात

जब कोई नहीं था मेरे साथ।

इठलाती, नाचती छः साल की परी थी,

मैं अपने मम्मी-पापा की लाडली थी। सुला दिया था उस रात बड़े प्यार से मां ने मुझे घर पर,

पता नहीं था नींद में मुझे ले जाएगा।। 'वो' मौत का साया बनकर ।

जब नींद से जागी तो बहुत अकेली और डरी थी मैं,

सिसकियां लेकर मम्मी-पापा को याद बहुत कर रही थी मैं।

न जाने क्या-क्या किया मेरे साथ,

मैं चीखती थी, चिल्लाती थी,

हां, फिर एक निर्भया

लेकिन किसी ने न सुनी मेरी आवाज ।

थी गुड़ियों से खेलने की उम्र मेरी,

पर उसने मुझे खिलौना बना दिया।

'वो' भी तो या तीन बच्चों का पिता,

फिर मुझे क्यों किया अपनों से जुदा। खेल-खेलकर मुझे तोड़ दिया,

फिर मेरा मुंह दबाकर,

मसला हुआ झाड़ियों में छोड़ दिया।

हां मैं हूं निर्भया, हां फिर एक निर्भया, एक छोटा सा प्रश्न उठा रही हूं जो नारी का अपमान करे

क्या इंसाफ निर्भया को मिला

वह मुझे मिल सकता है।
- तबस्सुम खान, विशेष न्यायाधीश

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