Edited By Parveen Kumar,Updated: 03 Jan, 2026 06:51 PM

इंडस्ट्रियल डिमांड में लगातार मजबूती के चलते मेटल मार्केट में एक बार फिर तेज़ी देखने को मिल रही है। साल 2026 में जहां सोना और चांदी निवेशकों के फोकस में थे, वहीं अब कुछ इंडस्ट्रियल मेटल्स ने भी रफ्तार पकड़ ली है। सीमित आपूर्ति और मजबूत मांग के चलते...
नेशनल डेस्क: इंडस्ट्रियल डिमांड में लगातार मजबूती के चलते मेटल मार्केट में एक बार फिर तेज़ी देखने को मिल रही है। साल 2026 में जहां सोना और चांदी निवेशकों के फोकस में थे, वहीं अब कुछ इंडस्ट्रियल मेटल्स ने भी रफ्तार पकड़ ली है। सीमित आपूर्ति और मजबूत मांग के चलते एल्युमीनियम, कॉपर और निकेल जैसी धातुओं की कीमतें नए रिकॉर्ड के करीब पहुंच गई हैं।
तीन साल से ज्यादा समय बाद एल्युमीनियम की कीमत 3,000 अमेरिकी डॉलर प्रति टन के पार निकल चुकी है, जबकि कॉपर रिकॉर्ड स्तर के बेहद करीब पहुंच गया है। इन धातुओं के महंगे होने का सीधा असर अब आम लोगों पर पड़ सकता है, क्योंकि कंपनियां रसोई उपकरणों से लेकर बाथरूम फिटिंग तक के दाम बढ़ाने के संकेत दे रही हैं।
एल्युमीनियम और कॉपर में क्यों आई जोरदार तेजी
एल्युमीनियम की कीमतों में उछाल के पीछे कई वैश्विक कारण हैं। चीन में गलाने की क्षमता पर लगे प्रतिबंध, यूरोप में ऊंची बिजली लागत के कारण घटता उत्पादन और सप्लाई से जुड़ी संरचनात्मक बाधाओं ने बाजार को टाइट कर दिया है। वहीं मैन्युफैक्चरिंग, रिन्यूएबल एनर्जी और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से दीर्घकालिक मांग बनी हुई है। यही वजह है कि वायदा बाजार में एल्युमीनियम की कीमतों में पिछले साल 17 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो 2021 के बाद सबसे मजबूत सालाना ग्रोथ है।
कॉपर की बात करें तो यह इंडस्ट्रियल मेटल सेक्टर का सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाला मेटल बनकर उभरा है। 2009 के बाद से सबसे बड़ी सालाना तेजी दर्ज करने के बाद, सप्लाई में बार-बार आ रही रुकावटों के चलते लंदन मेटल एक्सचेंज पर इसकी कीमतें 12,000 अमेरिकी डॉलर प्रति टन के ऊपर पहुंच गई हैं।
आखिर इन मेटल्स में तेजी की वजह क्या है?
इंडोनेशिया, चिली और कांगो में खनन दुर्घटनाओं, चिली की एक बड़ी खदान में आई तकनीकी दिक्कतों और अस्थायी उत्पादन रुकावटों ने सप्लाई को और सीमित कर दिया है। इसके अलावा वैश्विक व्यापार को लेकर अनिश्चितताओं के चलते ट्रेडर्स ने अमेरिका की ओर शिपमेंट बढ़ाया, जिससे बाजार पर दबाव और बढ़ गया।
दुनिया के सबसे बड़े निकेल उत्पादक इंडोनेशिया ने इस साल निकेल उत्पादन में कटौती की योजना बनाई है। खदानों में अस्थायी रोक और सप्लाई को लेकर बढ़ती चिंता ने भी कीमतों को ऊपर धकेला है। उधर, पिछले साल सोने और चांदी में आई शानदार तेजी के बाद निवेशकों की दिलचस्पी कमोडिटी मार्केट में और बढ़ गई है।
विश्लेषकों के मुताबिक गिरती ब्याज दरें, कमजोर डॉलर, चीन की आर्थिक रिकवरी को लेकर बेहतर होती उम्मीदें, एआई और नई ऊर्जा परियोजनाओं में बढ़ता निवेश- ये सभी फैक्टर मेटल प्राइस को सपोर्ट कर रहे हैं।
अब आम लोगों पर पड़ेगा असर
मेटल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर घरेलू बजट पर दिखने लगा है। एयर कंडीशनर, किचन प्रोडक्ट्स, बाथरूम फिटिंग और खाना पकाने के बर्तन जैसे कॉपर और एल्युमीनियम से बने उत्पाद महंगे हो सकते हैं। MCX पर कॉपर की कीमत करीब 1,300 रुपये प्रति किलो तक पहुंच चुकी है, जो इस साल अब तक 6 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी दिखाती है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, टिकाऊ वस्तुओं और घरेलू उपकरण बनाने वाली कंपनियों का कहना है कि कच्चे माल की लागत बढ़ने से कीमतों में इजाफा करना मजबूरी हो सकता है। कॉपर और एल्युमीनियम की हिस्सेदारी ज्यादा होने के कारण कंपनियां 5 से 8 फीसदी तक दाम बढ़ा सकती हैं, ताकि मुनाफा बरकरार रखा जा सके।
एक्सपर्ट्स का क्या कहना है?
गोल्डमैन सैक्स ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि सप्लाई में रुकावट, नीतिगत बदलाव और लगातार वैश्विक निवेश के कारण औद्योगिक धातुओं की कीमतों में तेजी बनी हुई है। बैंक का अनुमान है कि तांबे की औसत कीमतें 2026 की पहली छमाही तक ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती हैं।