New Labour Code: सैलरी, PF और ग्रेच्युटी को लेकर सरकार का बड़ा फैसला, नए लेबर कोड में ये सब ऐसे होगा तय

Edited By Updated: 01 Jan, 2026 04:03 PM

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भारत सरकार ने चार नए लेबर कोड्स के तहत ड्राफ्ट नियम और FAQs जारी कर दिए हैं, जो सैलरी स्ट्रक्चर में बड़े बदलाव लाएंगे। नए "50 प्रतिशत नियम" के तहत भत्ते कुल वेतन के आधे से अधिक नहीं हो सकते, जिससे बेसिक पे बढ़ेगी और पीएफ व ग्रेच्युटी में इजाफा होगा।...

नेशनल डेस्क : भारत में नौकरीपेशा कर्मचारियों की सैलरी, पीएफ और ग्रेच्युटी को लेकर लंबे समय से बनी अनिश्चितता अब काफी हद तक दूर होती दिख रही है। इसकी वजह हैं चार नए लेबर कोड, जो कानून के रूप में पहले ही पारित हो चुके हैं, लेकिन अब तक उनके नियम पूरी तरह लागू नहीं हो पाए थे। इस बीच श्रम मंत्रालय ने इन नए लेबर कोड्स के तहत ड्राफ्ट रूल्स और उनसे जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs) सार्वजनिक कर दिए हैं।

इन ड्राफ्ट नियमों के जरिए सरकार ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि आने वाले समय में कर्मचारियों की सैलरी संरचना कैसी होगी, वेतन की परिभाषा क्या मानी जाएगी और ग्रेच्युटी की गणना किस आधार पर की जाएगी। इन प्रस्तावित बदलावों का असर देश के करोड़ों कर्मचारियों पर पड़ेगा, जिनमें नियमित सैलरीड कर्मचारी, कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले और फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉई सभी शामिल हैं। इसके साथ ही कंपनियों को भी अपनी सैलरी स्ट्रक्चर और अकाउंटिंग सिस्टम में बड़े बदलाव करने होंगे।

वेतन की एक समान परिभाषा
अब तक भारत में अलग-अलग श्रम कानूनों के तहत वेतन की परिभाषा अलग-अलग थी। कहीं सिर्फ बेसिक सैलरी को आधार माना जाता था, कहीं महंगाई भत्ता (डीए) जोड़ा जाता था और कहीं पूरी सैलरी को ही वेतन मान लिया जाता था। नए लेबर कोड्स में पहली बार पूरे देश के लिए वेतन की एक समान परिभाषा तय की गई है, जो सभी श्रम कानूनों पर लागू होगी। सरकार का मानना है कि इससे लंबे समय से चली आ रही उलझन खत्म होगी और कर्मचारियों को बेहतर सामाजिक सुरक्षा मिल सकेगी।

सैलरी में क्या-क्या शामिल होगा
ड्राफ्ट नियमों के मुताबिक वेतन में मुख्य रूप से बेसिक पे, महंगाई भत्ता (डीए) और रिटेनिंग अलाउंस शामिल किए जाएंगे। इसके साथ ही एक अहम प्रावधान जोड़ा गया है, जिसे आम तौर पर “50 प्रतिशत नियम” कहा जा रहा है। इस नियम के अनुसार किसी भी कर्मचारी की कुल सैलरी में अलाउंस का हिस्सा 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकता।

यदि किसी कर्मचारी की कुल सैलरी 60 या 70 हजार रुपये है और उसमें बेसिक सैलरी कम रखकर बाकी रकम अलग-अलग अलाउंस के रूप में दिखाई गई है, तो नया नियम लागू होने पर कुल सैलरी का कम से कम आधा हिस्सा वेतन माना जाएगा। अगर अलाउंस 50 प्रतिशत से ज्यादा होंगे, तो अतिरिक्त राशि अपने आप वेतन में जोड़ दी जाएगी। इसका सीधा असर पीएफ और ग्रेच्युटी की गणना पर पड़ेगा, क्योंकि ये दोनों ज्यादा रकम के आधार पर तय होंगी।

सैलरी छिपाने पर लगेगी रोक
अब तक कई कंपनियां पीएफ और ग्रेच्युटी की देनदारी कम रखने के लिए बेसिक सैलरी को जानबूझकर कम दिखाती थीं। नए नियमों के लागू होने के बाद ऐसा करना आसान नहीं रहेगा। यही कारण है कि सरकार इस बदलाव को कर्मचारियों के हित में एक बड़ा कदम बता रही है।

ड्राफ्ट नियमों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि कौन-कौन से भुगतान वेतन का हिस्सा नहीं माने जाएंगे। परफॉर्मेंस से जुड़े इंसेंटिव, ईएसओपी (ESOPs), वैरिएबल पे और खर्चों की रीइंबर्समेंट को वेतन की परिभाषा से बाहर रखा गया है। इसके अलावा लीव एनकैशमेंट को लेकर भी स्थिति साफ कर दी गई है कि इसे अलाउंस का हिस्सा नहीं माना जाएगा। इससे कर्मचारियों और कंपनियों के बीच इस मुद्दे पर चल रही बहस को काफी हद तक खत्म करने की कोशिश की गई है।

ग्रेच्युटी को लेकर बड़े बदलाव
नए लेबर कोड्स में सबसे ज्यादा चर्चा ग्रेच्युटी के नियमों को लेकर हो रही है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत अब ग्रेच्युटी की गणना केवल बेसिक सैलरी के आधार पर नहीं होगी, बल्कि कर्मचारी को आखिरी बार मिलने वाले वेतन के आधार पर की जाएगी। चूंकि वेतन की परिभाषा अब पहले से व्यापक हो गई है, इसलिए जिन कर्मचारियों की सैलरी अलाउंस पर ज्यादा निर्भर थी, उनकी ग्रेच्युटी अपने आप बढ़ सकती है।

ड्राफ्ट में यह भी साफ किया गया है कि ग्रेच्युटी के नए नियम पीछे की तारीख से लागू नहीं होंगे। यह व्यवस्था 21 नवंबर 2025 से प्रभावी मानी जाएगी। यानी जो कर्मचारी इस तारीख के बाद नौकरी छोड़ेंगे या रिटायर होंगे, उन्हें ही नई व्यवस्था के तहत ग्रेच्युटी का लाभ मिलेगा।

फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों को राहत
फिक्स्ड टर्म और कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के लिए भी एक बड़ा बदलाव सामने आया है। नए FAQs के मुताबिक अब फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों को ग्रेच्युटी के लिए पांच साल की सेवा पूरी करने की जरूरत नहीं होगी। यदि उनका कॉन्ट्रैक्ट पूरा होता है, तो एक साल की सेवा के बाद ही वे ग्रेच्युटी के हकदार हो जाएंगे। यह बदलाव उन लाखों कर्मचारियों के लिए राहत लेकर आया है, जो एक या दो साल के कॉन्ट्रैक्ट पर काम करते हैं।

कंपनियों पर बढ़ेगी जिम्मेदारी
इन बदलावों का मतलब कंपनियों के लिए बढ़ती लागत और नई अकाउंटिंग जिम्मेदारियां भी हैं। ग्रेच्युटी की देनदारी अब पहले से ज्यादा हो सकती है और कंपनियों को इसे अपने वित्तीय खातों में समय पर दिखाना होगा। यदि कोई कर्मचारी 21 नवंबर 2025 के बाद कंपनी छोड़ता है, तो उसकी बढ़ी हुई ग्रेच्युटी का असर उसी वित्तीय वर्ष के खातों में दिखाई देगा।

ओवरटाइम को लेकर सख्ती
ड्राफ्ट नियमों में ओवरटाइम को लेकर भी सख्त प्रावधान किए गए हैं। हफ्ते में 48 घंटे से ज्यादा काम कराने पर कर्मचारियों को दोगुनी मजदूरी देनी होगी। लंबे समय तक बिना ब्रेक काम कराना प्रतिबंधित होगा और कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से आराम दिया जाएगा। कुछ सेक्टर्स में उम्रदराज कर्मचारियों के लिए मेडिकल चेक-अप और बच्चों के लिए क्रेच सुविधा से जुड़े नियम भी जोड़े गए हैं।

कर्मचारियों के लिए क्या बदलेगा
कुल मिलाकर नए लेबर कोड्स का उद्देश्य सैलरी सिस्टम को ज्यादा पारदर्शी और न्यायसंगत बनाना है। शुरुआती दौर में हो सकता है कि कर्मचारियों की टेक-होम सैलरी में कोई बड़ा फर्क न दिखे, लेकिन लंबे समय में पीएफ, ग्रेच्युटी और रिटायरमेंट से जुड़े फायदे मजबूत होंगे। फिलहाल ये नियम ड्राफ्ट के रूप में हैं और सुझावों के बाद इनमें बदलाव संभव है, लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि आने वाले समय में सैलरी और ग्रेच्युटी को लेकर व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।

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