Edited By Radhika,Updated: 18 Jan, 2026 12:37 PM

प्रेमानंद महाराज सत्संग के दौरान अक्सर भक्तों की समस्यों और प्रश्नों को सुनते हैं और उनका बहुत आसान तरीके जवाब देते हैं। हाल ही में महाराज ने एक भक्त के सवाल का जवाब देते हुए जीवन की बड़ी उलझन सुलझाई है। महाराज जी ने बताया कि अक्सर लोग 'गलती' और...
Premanand Maharaj: प्रेमानंद महाराज सत्संग के दौरान अक्सर भक्तों की समस्यों और प्रश्नों को सुनते हैं और उनका बहुत आसान तरीके जवाब देते हैं। हाल ही में महाराज ने एक भक्त के सवाल का जवाब देते हुए जीवन की बड़ी उलझन सुलझाई है। महाराज जी ने बताया कि अक्सर लोग 'गलती' और 'पाप' को एक ही समझ लेते हैं, जबकि इन दोनों के पीछे की मानसिक स्थिति पूरी तरह अलग होती है।
इच्छा और नीयत का खेल
महाराज जी के अनुसार किसी कार्य के पीछे की मंशा ही यह तय करती है कि वह गलती है या पाप।
गलती: जब कोई काम बिना किसी योजना के, अचानक या असावधानीवश हो जाए, तो वह गलती कहलाती है। जैसे चलते-फिरते किसी को धक्का लग जाना। इसमें किसी को नुकसान पहुँचाने की बुरी नियत नहीं होती।
पाप: जब व्यक्ति यह जानते हुए भी कि कार्य गलत है, उसे पूरी योजना और इच्छा के साथ करता है, तो वह 'पाप' की श्रेणी में आता है। यहाँ व्यक्ति का विवेक उसे टोकता है, फिर भी वह गलत रास्ते को चुनता है।

प्रायश्चित का मार्ग:
महाराज जी ने सांत्वना देते हुए कहा कि यदि किसी से पाप भी हो गया है, तो उसे निराश नहीं होना चाहिए। प्रायश्चित का सबसे उत्तम तरीका है कि व्यक्ति अपनी भूल को स्वीकार करे और संकल्प ले कि वह इसे दोबारा नहीं दोहराएगा। उन्होंने 'नाम जप' (भगवान के नाम का स्मरण) को मन की सफाई का सबसे बड़ा साधन बताया। उनके अनुसार निरंतर भक्ति और कीर्तन से न केवल पुराने पाप नष्ट होते हैं, बल्कि व्यक्ति का स्वभाव भी शुद्ध और सात्विक हो जाता है।