US-Iran युद्ध का नया खतरा: ईरान बंद देगा दुनिया का इंटरनेट? भारत भी होगा प्रभावित!

Edited By Updated: 20 Mar, 2026 09:35 AM

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पश्चिम एशिया की धधकती आग अब केवल ज़मीन और आसमान तक सीमित नहीं रही, बल्कि गहरे समंदर के भीतर छिपे उस जाल तक पहुंच गई है जिस पर पूरी दुनिया का अस्तित्व टिका है। इज़रायल-ईरान संघर्ष और लाल सागर में बढ़ते तनाव ने एक ऐसी नई और खौफनाक आशंका को जन्म दिया...

इंटरनेशनल डेस्क: पश्चिम एशिया की धधकती आग अब केवल ज़मीन और आसमान तक सीमित नहीं रही, बल्कि गहरे समंदर के भीतर छिपे उस जाल तक पहुंच गई है जिस पर पूरी दुनिया का अस्तित्व टिका है। इज़रायल-ईरान संघर्ष और लाल सागर में बढ़ते तनाव ने एक ऐसी नई और खौफनाक आशंका को जन्म दिया है, जो पूरी दुनिया को 'ऑफलाइन' कर सकती है। ऊर्जा संकट और पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती कीमतों के बीच अब वैश्विक विशेषज्ञों की नींद इस बात पर उड़ी है कि क्या ईरान और उसके सहयोगी संगठन दुनिया के इंटरनेट कनेक्शन को काट सकते हैं?

समंदर की गहराई में छिपा है आधुनिक सभ्यता का आधार
आज हम जो वीडियो कॉल करते हैं, जिस ईमेल को भेजते हैं या एआई (AI) और बैंकिंग सेवाओं का उपयोग करते हैं, उसका 95 प्रतिशत से अधिक डेटा उपग्रहों से नहीं, बल्कि समंदर के सीने में बिछी हज़ारों किलोमीटर लंबी फाइबर-ऑप्टिक केबल्स के ज़रिए गुज़रता है। लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) दुनिया के वे सबसे संवेदनशील 'नर्व सेंटर' हैं, जहां से महाद्वीपों को जोड़ने वाली ये डिजिटल नसें गुज़रती हैं। लाल सागर में लगभग 17 ऐसी प्रमुख सबसी केबल्स हैं जो यूरोप, अफ्रीका और एशिया के बीच सेतु का काम करती हैं। वहीं, होर्मुज के रास्ते से 'AAE-1', 'FALCON' और 'Tata-TGN Gulf' जैसी महत्वपूर्ण प्रणालियां गुज़रती हैं, जो विशेष रूप से भारत और खाड़ी देशों के डेटा ट्रैफिक के लिए रीढ़ की हड्डी के समान हैं।

मरम्मत के नाम से ही कांप रहे हैं जहाजों के मालिक
खतरा केवल केबल्स के कटने का नहीं है, बल्कि उन्हें ठीक न कर पाने की लाचारी का भी है। ईरान द्वारा होर्मुज में समुद्री माइंस बिछाने की धमकियों और हौथी विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में जहाजों पर किए जा रहे हमलों ने इस पूरे इलाके को 'नो-गो ज़ोन' बना दिया है। अगर कोई मिसाइल, एंकर या जानबूझकर किया गया हमला इन केबल्स को नुकसान पहुंचाता है, तो उनकी मरम्मत करने वाले विशेष जहाजों का वहां पहुंचना लगभग असंभव होगा। बीमा कंपनियों और जहाज मालिकों ने पहले ही इस युद्ध क्षेत्र में जाने से हाथ खड़े कर दिए हैं, जिसका अर्थ है कि एक छोटा सा कट भी हफ्तों या महीनों तक इंटरनेट को ठप कर सकता है।

टेक दिग्गजों और भारत की बढ़ती धड़कनें
Amazon, Google और Microsoft जैसी वैश्विक कंपनियों ने हाल के वर्षों में सऊदी अरब और UAE में अपने विशाल डेटा सेंटर स्थापित किए हैं। ये केबल्स ही उन सेंटरों को एशियाई और अफ्रीकी बाज़ारों से जोड़ती हैं। यदि इन पर प्रहार होता है, तो केवल सोशल मीडिया ही नहीं रुकेगा, बल्कि स्टॉक मार्केट, अस्पताल की डिजिटल सेवाएं और बैंकिंग सिस्टम पूरी तरह चरमरा जाएंगे। भारत के लिए यह स्थिति और भी गंभीर है क्योंकि हमारा अधिकांश डेटा ट्रैफिक इन्हीं समुद्री रास्तों से होकर आता है। केबल्स के प्रभावित होने का सीधा मतलब है इंटरनेट की रफ़्तार में भारी गिरावट और डेटा को लंबे वैकल्पिक रास्तों से भेजने की मजबूरी, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'डेटा लैग' की समस्या पैदा होगी।

क्या वाकई थम जाएगी डिजिटल दुनिया?
अभी तक इंटरनेट केबल्स काम कर रही हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि 2024 में हौथी हमलों के दौरान कुछ केबल्स क्षतिग्रस्त हुई थीं, जिससे कई देशों में डिजिटल संचार धीमा हो गया था। अब आशंका यह है कि यदि होर्मुज और लाल सागर दोनों रास्ते एक साथ प्रभावित होते हैं, तो यह इतिहास का सबसे बड़ा 'डिजिटल ब्लैकआउट' साबित हो सकता है। दुनिया अब एक ऐसे दोराहे पर है जहाँ युद्ध केवल सीमाओं को नहीं बदल रहा, बल्कि उस अदृश्य धागे को भी तोड़ने की कगार पर है जिसने हमें ग्लोबलाइजेशन के दौर में एक-दूसरे से जोड़ रखा है।

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