मौत का धुआं: मिडिल ईस्ट की जंग में इंसानियत ही नहीं, प्रकृति का भी हो रहा है कत्लेआम

Edited By Updated: 06 Mar, 2026 03:40 PM

learn how the war in the middle east is becoming a silent killer for the planet

मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव दुनिया को एक ऐसे विनाश की ओर धकेल रहा है जिसकी भरपाई नामुमकिन है। मिसाइल हमलों और बम धमाकों के बीच हम अक्सर इंसानी जानों और आर्थिक नुकसान की बात करते हैं लेकिन इस जंग ने पर्यावरण के खिलाफ एक...

Environmental Impact of Middle East Conflict : मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव दुनिया को एक ऐसे विनाश की ओर धकेल रहा है जिसकी भरपाई नामुमकिन है। मिसाइल हमलों और बम धमाकों के बीच हम अक्सर इंसानी जानों और आर्थिक नुकसान की बात करते हैं लेकिन इस जंग ने पर्यावरण के खिलाफ एक ऐसा मोर्चा खोल दिया है जो सदियों पुराने इकोसिस्टम को चंद पलों में राख कर रहा है।

1. इंस्टीट्यूशनल एमिशन का दानव: सबसे बड़ा प्रदूषक है सेना

जंग में इस्तेमाल होने वाले जेट फ्यूल, डीजल और पेट्रोल कार्बन उत्सर्जन (Carbon Emission) के सबसे बड़े स्रोत हैं। अमेरिकी मिलिट्री दुनिया की सबसे बड़ी 'संस्थागत उत्सर्जक' (Institutional Emitter) है। गाजा में शुरुआती 120 दिनों की जंग में इतना प्रदूषण हुआ जितना 26 छोटे देश मिलकर पूरे एक साल में करते हैं।

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2. बदला समुद्री रास्ता और बढ़ता कार्बन फुटप्रिंट

रेड सी (Red Sea) में असुरक्षा के कारण शिपिंग कंपनियों ने अपने रास्ते बदल दिए हैं। जहाज अब स्वेज नहर के बजाय अफ्रीका का चक्कर लगाकर जा रहे हैं। रास्ता लंबा होने से ईंधन की खपत बढ़ गई है जिससे कार्बन फुटप्रिंट में 50% से 70% तक का इजाफा हुआ है।

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3. वॉटर बैंकरप्सी की कगार पर ईरान

ईरान इस जंग में अपनी सबसे कमजोर स्थिति में है। वह पहले से ही वॉटर बैंकरप्सी (पानी का दिवालियापन) का सामना कर रहा है। अत्यधिक दोहन के कारण ईरान की जमीन धंस रही है और बड़े शहरों में रात के समय पानी की सप्लाई ठप हो जाती है। तेहरान दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक है। जंग के कारण रिफाइनरियों पर हमले इस प्रदूषण को जानलेवा स्तर तक ले जा रहे हैं।

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4. स्वास्थ्य पर पीएम 2.5 और सिलिकोसिस का हमला

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार यह जंग कम से कम 10 साल तक अपने निशान छोड़ेगी।

पीएम 2.5 (PM 2.5): विस्फोटों से निकलने वाले बारीक कण फेफड़ों में गहराई तक समा जाते हैं। चूंकि मिडिल ईस्ट में बारिश कम होती है इसलिए यह जहरीली धूल हवा में लंबे समय तक टिकी रहेगी।

सिलिकोसिस: बमबारी से उड़ने वाली सिलिका युक्त धूल से सैनिकों और नागरिकों में फेफड़ों की गंभीर बीमारियां होने का खतरा बढ़ गया है।

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5. समुद्री इकोसिस्टम पर ऑयल स्पिल का खतरा

ईरान और खाड़ी देशों के बीच ऑयल टैंकरों पर हमले समुद्री जीवन के लिए काल बन रहे हैं। तेल का रिसाव न केवल मछलियों और समुद्री पौधों को नष्ट कर रहा है बल्कि उन प्रजातियों को भी खत्म कर रहा है जिनकी अभी पहचान तक नहीं हुई है।

 

6. ग्लोबल क्लाइमेट टारगेट को लगा ब्रेक

जंग की वजह से दुनिया का ध्यान स्वच्छ ऊर्जा और 'सतत विकास लक्ष्यों' (SDG) से हटकर सैन्य खर्च पर चला गया है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि जो कार्बन डाइऑक्साइड आज पर्यावरण में घुल रही है उसकी उम्र 120 साल है। यानी आज की जंग का असर 22वीं सदी तक महसूस किया जाएगा।

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