Edited By Sahil Kumar,Updated: 02 Mar, 2026 03:16 PM

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को लेकर भारत सरकार सतर्क है और प्रधानमंत्री कार्यालय समेत प्रमुख मंत्रालय हालात की लगातार समीक्षा कर रहे हैं। आशंका है कि यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, रुपये में गिरावट और विदेशी निवेश में कमी...
नेशनल डेस्कः पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक बाज़ारों के साथ भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। केंद्र सरकार हालात पर करीबी नजर रखे हुए है और आशंका जताई जा रही है कि यदि संघर्ष लंबा खिंचा तो तेल की बढ़ती कीमतें, रुपये में उतार-चढ़ाव और चालू खाते के घाटे के जरिए देश की आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यों के दो दिवसीय दौरे से लौटने के बाद सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति की बैठक की अध्यक्षता कर ताज़ा हालात की समीक्षा की। वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, सरकार क्षेत्रीय घटनाक्रम और उसके संभावित आर्थिक प्रभावों पर करीबी नजर बनाए हुए है।
हाल ही में इज़राइल और अमेरिका ने ईरान पर संयुक्त सैन्य कार्रवाई की। इस हमले में कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के मारे जाने की खबर सामने आई। खाड़ी क्षेत्र में लंबे समय तक अस्थिरता की आशंका को देखते हुए अर्थशास्त्रियों ने शेयर बाजार, ऊर्जा बाजार और रुपये में बढ़ती अस्थिरता की चेतावनी दी है।
रुपये और विदेशी मुद्रा भंडार पर नजर
नोमुरा की इंडिया और एशिया (जापान को छोड़कर) की मैनेजिंग डायरेक्टर एवं मुख्य अर्थशास्त्री सोनल वर्मा ने कहा है कि एशिया की अर्थव्यवस्थाओं में भारत उन देशों में शामिल है, जिन पर तेल की ऊंची कीमतों का असर अधिक दिखाई देता है। स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक की इंडिया इकोनॉमिक रिसर्च प्रमुख अनुभूति सहाय के अनुसार, भारत पर इसका असर मुख्य रूप से अप्रत्यक्ष चैनलों के माध्यम से पड़ेगा—जैसे कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि और वैश्विक निवेशकों का जोखिम से बचने का रुख।
हालांकि, उनका मानना है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है, जिससे रुपये में अत्यधिक कमजोरी को नियंत्रित किया जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्थिति कितनी जल्दी सामान्य होती है, यह बेहद महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि लंबा संघर्ष महंगाई और विकास दर दोनों को प्रभावित कर सकता है।
तेल आयात पर निर्भरता चिंता का कारण
भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का 85 से 89 प्रतिशत तक आयात करता है। इसका लगभग आधा कच्चा तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है, जो वर्तमान तनाव का केंद्र है। बीते एक महीने में कच्चे तेल की कीमत लगभग 65 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 82 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। शुक्रवार को विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बीच रुपया डॉलर के मुकाबले 17 पैसे गिरकर 91.08 के स्तर पर बंद हुआ। विशेषज्ञों के मुताबिक, तेल की कीमतों में हर 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी से भारत की जीडीपी पर लगभग 0.4 प्रतिशत तक असर पड़ सकता है।
हालांकि, सोनल वर्मा का मानना है कि फिलहाल तेल विपणन कंपनियों द्वारा पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी की संभावना कम है, जिससे महंगाई पर तात्कालिक दबाव सीमित रह सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि चालू खाता घाटा जीडीपी के लगभग 1 प्रतिशत के आसपास प्रबंधनीय स्तर पर है, लेकिन भू-राजनीतिक अनिश्चितता के कारण पूंजी खाते पर दबाव बढ़ सकता है।
महंगाई और दोहरे घाटे पर प्रभाव की आशंका
इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर के अनुसार, अभी भारत की घरेलू मांग और आर्थिक बुनियाद मजबूत है, जो राहत का संकेत देती है। लेकिन यदि पश्चिम एशिया में संकट लंबा चलता है तो इसका असर महंगाई, राजकोषीय और चालू खाते के घाटे तथा प्रवासी भारतीयों से आने वाले रेमिटेंस पर पड़ सकता है। जनवरी में खुदरा महंगाई दर 2.75 प्रतिशत दर्ज की गई थी, जो फिलहाल नियंत्रण में है। बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस का मानना है कि बॉन्ड यील्ड पर बहुत अधिक असर की संभावना नहीं है, लेकिन रुपये में अस्थिरता बढ़ सकती है।