Edited By Mehak,Updated: 18 Jan, 2026 03:42 PM

वृंदावन के प्रसिद्ध कथावाचक प्रेमानंद महाराज के अनुसार, शास्त्रों में केवल एक ही ऐसा पाप बताया गया है जिसे महापाप माना गया है। उन्होंने कहा कि भगवान के भक्त के प्रति द्रोह करना सबसे बड़ा अपराध है, जिसकी क्षमा देवी-देवता भी नहीं करते। द्रोह का अर्थ...
नेशनल डेस्क : अक्सर कहा जाता है कि इंसान से जीवन में गलतियां होना स्वाभाविक है। आगे बढ़ते हुए व्यक्ति कई बार चूक करता है, लेकिन जो अपनी गलतियों से सीख लेकर उन्हें दोबारा नहीं दोहराता, वही सच्चे अर्थों में बेहतर इंसान माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रायश्चित करने से व्यक्ति के अधिकांश पाप क्षमा हो जाते हैं, लेकिन शास्त्रों में एक ऐसे पाप का उल्लेख है जिसे महापाप कहा गया है।
वृंदावन के प्रसिद्ध कथावाचक और आध्यात्मिक संत प्रेमानंद महाराज ने इस विषय पर विस्तार से बात की है। राधा-कृष्ण की भक्ति में लीन प्रेमानंद महाराज के अनुसार, शास्त्रों में केवल एक ही ऐसा पाप बताया गया है जिसे भगवान भी क्षमा नहीं करते।
एक भक्त द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में प्रेमानंद महाराज ने कहा कि भगवान के भक्त के प्रति द्रोह करना सबसे बड़ा पाप है। उन्होंने बताया कि पूरी सृष्टि में यही एक ऐसा अपराध है, जिसकी क्षमा स्वयं भगवान भी नहीं देते। उनके अनुसार, जो व्यक्ति भगवान के सच्चे भक्त के साथ छल, द्वेष या दुर्भावना रखता है, वह गंभीर पाप का भागी बनता है। द्रोह का अर्थ जानबूझकर किसी को मानसिक या भावनात्मक रूप से कष्ट पहुंचाना होता है। यह भावना ईर्ष्या, शत्रुता या नकारात्मक सोच से जन्म लेती है और व्यक्ति के आचरण में दिखाई देती है।
प्रेमानंद महाराज ने बताया कि द्रोह के पाप से बचने के लिए व्यक्ति को अपने मन को नियंत्रित करना चाहिए। यदि किसी के प्रति मन में कटुता है तो पहले उसके कारण पर विचार करना चाहिए। यदि वजह छोटी हो तो तुरंत क्षमा कर देना ही श्रेष्ठ मार्ग है। वहीं, यदि मामला गंभीर हो, तो भी यह समझना चाहिए कि नकारात्मक भावना रखने से सामने वाले को नहीं, बल्कि स्वयं को ही नुकसान होता है। उन्होंने कहा कि शांति, संवाद और समाधान का रास्ता अपनाकर ही व्यक्ति अपने मन को हल्का कर सकता है और पाप से बच सकता है। भक्ति और सद्भाव से ही जीवन को सही दिशा मिलती है।