Edited By Rohini Oberoi,Updated: 21 May, 2026 12:29 PM
इस वर्ष यानि कि 2026 में गर्मी के सारे रिकॉर्ड टूट जाएंगे और धरती भट्ठी की तरह तपेगी। मौसम वैज्ञानिकों की यह ताजा चेतावनी जितनी खौफनाक है उतनी ही तकनीकी भी। वैज्ञानिक कह रहे हैं कि इस महा-संकट के पीछे साधारण 'एल नीन्यो' नहीं, बल्कि 'सुपर एल नीन्यो'...
El Nino Effect : इस वर्ष यानि कि 2026 में गर्मी के सारे रिकॉर्ड टूट जाएंगे और धरती भट्ठी की तरह तपेगी। मौसम वैज्ञानिकों की यह ताजा चेतावनी जितनी खौफनाक है उतनी ही तकनीकी भी। वैज्ञानिक कह रहे हैं कि इस महा-संकट के पीछे साधारण 'एल नीन्यो' नहीं, बल्कि 'सुपर एल नीन्यो' (Super El Niño) का हाथ है। अमूमन आम लोग इन भारी-भरकम वैज्ञानिक शब्दों को समझ नहीं पाते। आखिर दूर समंदर में होने वाली यह हलचल भारत में आग क्यों बरसाने लगती है? आइए बिना किसी उलझाव के नक्शे और बेहद आसान भाषा में इसका पूरा भूगोल और विज्ञान समझते हैं।
स्पैनिश भाषा का शब्द 'एल नीन्यो' जानें क्या है?
'एल नीन्यो' मूल रूप से स्पेनिश भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है— 'छोटा बच्चा' या 'बालक'।

स्पैनिश में क्यों है यह नाम?
इतिहास गवाह है कि भारत की तरह दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के ज्यादातर देशों पर कभी स्पेन का राज हुआ करता था। वहां जंगलों के बीच रहने वाले मूल निवासियों पर जब स्पेनिश संस्कृति हावी हुई तो वहां की मुख्य भाषा भी स्पैनिश बन गई (केवल ब्राजील को छोड़कर, जहां पुर्तगाली बोली जाती है)। दक्षिण अमेरिका के पास समुद्र में होने वाले इस मौसमी बदलाव को वहां के मछुआरों और वैज्ञानिकों ने 'एल नीन्यो' नाम दिया जो हर कुछ साल में लौट आता है।
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हम अमूमन जो नक्शा देखते हैं उसमें अमेरिका बाईं तरफ (पश्चिम) और एशिया-ऑस्ट्रेलिया दाईं तरफ (पूर्व) दिखते हैं लेकिन चूंकि दुनिया गोल है इसलिए अगर हम नक्शे को घुमाकर देखें तो ऑस्ट्रेलिया के ठीक आगे प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) है और उसके पार दक्षिण अमेरिका का किनारा (पेरू और एक्वाडोर जैसे देश) स्थित है। सामान्य दिनों में प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से (दक्षिण अमेरिका के पास) का पानी ठंडा रहता है। इसके विपरीत, पश्चिमी हिस्से (एशिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस के पास) का पानी बहुत गर्म होता है। पूर्व से पश्चिम की ओर लगातार चलने वाली हवाएं (जिन्हें ट्रेड विंड्स या व्यापारिक पवनें कहते हैं) समंदर के इस गर्म पानी को एशिया की तरफ धकेलती रहती हैं।

ऐसे शुरू होता है 'एल नीन्यो' का खेल
हर 2 से 7 साल में कभी-कभी ये हवाएं अचानक बहुत कमजोर पड़ जाती हैं मानो किसी ने हवा का स्विच बंद कर दिया हो। हवा कमजोर होते ही पश्चिम (एशिया) की तरफ जमा गर्म पानी वापस पूर्व (दक्षिण अमेरिका) की तरफ बहने लगता है। नतीजा यह होता है कि पूरे प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से 0.5 डिग्री या उससे ज्यादा गर्म हो जाता है। जब प्रशांत महासागर असामान्य रूप से गर्म होता है तो हवा का पूरा वैश्विक पैटर्न बदल जाता है। समुद्र का पानी गर्म होने से हवा ऊपर उठती है और बादल बनते हैं लेकिन हवा न चलने के कारण ये बादल एशिया की तरफ नहीं आ पाते और दक्षिण अमेरिका के पास ही बरस जाते हैं। वहां बाढ़ आ जाती है।
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भारत पर क्या पड़ेगा इसका असर?
भारत में मानसून (जून से सितंबर) मुख्य रूप से दक्षिण-पश्चिम हवाओं के जरिए हिंद महासागर और अरब सागर से नमी लेकर आता है। एल नीन्यो के कारण ये मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या अपना रास्ता बदल लेती हैं। भारत के आसमान में बादल कम बनते हैं और धूप सीधे जमीन पर पड़ती है। अप्रैल, मई और जून में कोई छांव न होने के कारण उत्तर भारत, मध्य भारत, राजस्थान, दिल्ली, यूपी और मध्य प्रदेश की धरती तेजी से तपने लगती है। (साल 2023 में भी एल नीन्यो की वजह से कई शहरों का तापमान 45-48 डिग्री तक चला गया था)।

आइए अब जानतें हैं क्या है 'सुपर एल नीन्यो'?
जब यह 'छोटा बच्चा' (एल नीन्यो) विकराल रूप ले लेता है तो उसे 'सुपर एल नीन्यो' कहा जाता है। अगर प्रशांत महासागर का साप्ताहिक तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा बढ़ जाए तो यह सुपर की श्रेणी में आता है। फिलहाल यह तापमान +0.9 डिग्री पार कर चुका है और समुद्र की गहराई में गर्म पानी का एक विशाल भंडार बनकर लगातार ऊपर आ रहा है। इतिहास में 1950 के बाद ऐसा भयानक रूप केवल 1982, 1997 और 2015 में देखा गया है।
वैज्ञानिकों को डर है कि पहले से ही ग्लोबल वॉर्मिंग (Global Warming) से जूझ रही पृथ्वी के लिए इस साल का सुपर एल नीन्यो पिछले 150 सालों में सबसे घातक साबित हो सकता है। यदि ऐसा हुआ तो भारत में मानसून बेहद कमजोर हो जाएगा भयंकर सूखा पड़ सकता है और हीटवेव (लू) के दौर लंबे और अधिक जानलेवा हो जाएंगे। संक्षेप में कहें तो साधारण एल नीन्यो से निपटने वाले भारत के लिए 'सुपर एल नीन्यो' धरती को सचमुच एक भट्ठी में बदल सकता है।