Edited By Sarita Thapa,Updated: 10 Apr, 2026 10:50 AM

भारतीय संस्कृति में आस्था के अनगिनत रंग देखने को मिलते हैं, लेकिन उड़ीसा के पुरी में आयोजित होने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा का दृश्य सबसे अलौकिक होता है।
Jagannath Rath Yatra 2026 Date : भारतीय संस्कृति में आस्था के अनगिनत रंग देखने को मिलते हैं, लेकिन उड़ीसा के पुरी में आयोजित होने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा का दृश्य सबसे अलौकिक होता है। यह विश्व का एकमात्र ऐसा उत्सव है जहां मंदिर के कपाट बंद नहीं होते, बल्कि स्वयं ब्रह्मांड के स्वामी, भगवान जगन्नाथ, अपने रत्नजड़ित सिंहासन को छोड़ कर आम जनता के बीच सड़क पर निकल आते हैं। वर्ष 2026 में आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को जब विशालकाय रथों के पहिये पुरी के मुख्य मार्ग पर घूमेंगे, तो श्रद्धा का एक ऐसा सैलाब उमड़ेगा जो जाति, धर्म और ऊंच-नीच की तमाम बेड़ियों को तोड़ देगा। यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि भगवान और भक्त के बीच उस अटूट प्रेम की गाथा है, जिसमें भक्त रथ की रस्सी खींचकर अपने आराध्य को अपने हृदय तक ले जाने की कोशिश करते हैं। तो आइए जानते हैं कि 2026 में यह महायात्रा किस दिन शुरू होगी, इसका आध्यात्मिक महत्व क्या है और वे कौन सी सदियों पुरानी परंपराएं हैं जो इस यात्रा को विश्व का सबसे अनूठा उत्सव बनाती हैं।
जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 तिथि
पुरी की विश्वप्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा प्रतिवर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को अत्यंत हर्षोल्लास के साथ आयोजित की जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर के बदलावों के कारण इसकी तारीख हर साल बदलती रहती है, जो आमतौर पर जून या जुलाई के मध्य आती है। वर्ष 2026 की बात करें, तो यह पावन उत्सव गुरुवार, 16 जुलाई को मनाया जाएगा। ज्योतिषीय गणना और पंचांग के अनुसार, द्वितीया तिथि का आरंभ 15 जुलाई 2026 को सुबह 11:50 बजे से होगा और इसका समापन16 जुलाई 2026 को सुबह 08:52 बजे होगा।
रथ यात्रा से जुड़ी अद्भुत परंपराएं
स्नान पूर्णिमा और अणसर काल: रथ यात्रा से 15 दिन पहले भगवान को 108 घड़ों के शाही स्नान कराया जाता है, जिसे 'स्नान पूर्णिमा' कहते हैं। इसके बाद भगवान बीमार पड़ जाते हैं और 15 दिनों तक एकांत में रहते हैं, जहां उन्हें औषधीय काढ़ा अर्पित किया जाता है।
छेरा पहरा : यात्रा शुरू होने से पहले पुरी के गजपति राजा खुद एक सेवक के रूप में आकर सोने की झाड़ू से रथों के रास्ते को साफ करते हैं। यह परंपरा सिखाती है कि भगवान के सामने राजा और रंक सब समान हैं।
गुंडिचा मंदिर प्रवास: भगवान जगन्नाथ अपने मुख्य मंदिर से 3 किलोमीटर दूर अपनी मौसी के घर 'गुंडिचा मंदिर' जाते हैं और वहां 9 दिनों तक विश्राम करते हैं।
धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धापूर्वक इन रथों की रस्सी खींचते हैं, उन्हें जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह दुनिया का एकमात्र ऐसा उत्सव है जहां स्वयं भगवान अपने मंदिर से बाहर निकलकर अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए गलियों में आते हैं, चाहे वे किसी भी जाति या धर्म के हों।
शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ